लोक प्रशासन - A UGC-CARE Listed Journal

Association with Indian Institute of Public Administration

Current Volume: 17 (2025 )

ISSN: 2249-2577

Periodicity: Quarterly

Month(s) of Publication: मार्च, जून, सितंबर और दिसंबर

Subject: Social Science

DOI: https://doi.org/10.32381/LP

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लोक प्रशासन भारतीय लोक प्रशासन संस्थान की एक सहकर्मी समीक्षा वाली त्रैमासिक शोध पत्रिका है ! यह UGC CARE LIST (Group -1 ) में दर्ज है ! इसके अंतर्गत लोक प्रशासन, सामाजिक विज्ञान, सार्वजनिक निति, शासन, नेतृत्व, पर्यावरण आदि से संबंधित लेख प्रकाशित किये जाते है !

EBSCO

अध्यक्ष एवं सम्पादक
श्री एस. एन. त्रिपाठी

महानिदेशक, आई. आई. पी. ए. 
नई दिल्ली


सह-सम्पादक
सपना चड्डा

सह-आचार्या, संवैधानिक तथा प्रशासनिक कानून,
भारतीय लोक प्रशासन संस्थान, नई दिल्ली 


सम्पादक मंडल
के.के. सेठी

अध्यक्ष, मध्यप्रदेश क्षेत्रीय शाखा (भारतीय लोक प्रशासन संस्थान) 


डा0 शशि भूषण कुमार

 आचार्य, हाजीपुर, बिहार 


प्रो. श्रीप्रकाश सिंह

आचार्य, दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिल्ली 


शुभा सर्मा

भा. प्र.से., प्रमुख सचिव, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, ओडिशा सरकार 


डा0 साकेत बिहारी 

 सह-आचार्य, विकास अध्ययन, भारतीय लोक प्रशासन संस्थान, नई दिल्ली


श्री अमिताभ रंजन

कुलसचिव, भारतीय लोक प्रशासन संस्थान, नई दिल्ली 


पाठ सम्पादक
स्नेहलता

 भारतीय लोक प्रशासन संस्थान, नई दिल्ली


Volume 17 Issue 4 , (Oct- to Dec-2025)

भारत में राजनीतिक सशक्तिकरण एवं महिला नेतृत्व

By: संतोष कुमार सिंह

Page No : 1-13

सार
लैंगिक समानता दुनिया की केवल आधी आबादी का ही चिंता का विषय नहीं है बल्कि यह एक मानव अधिकार है क्योंकि कोई भी समाज सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से विकास नहीं कर सकता; जब तक उसकी आधी आबादी हाशिए पर हो। महिलाओं को मुख्यधारा से बाहर रखने का अर्थ है कि आधी आबादी को सम्पन्न समाज और अर्थव्यवस्था के निर्माण में भागीदारी के अवसर से वंचित रखना। शिक्षा की समान सुलभता, लाभकारी काम और आर्थिक-राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया में सहभागिता न सिर्फ महिलाओं के लिए आवश्यक अधिकार हैं बल्कि इनसे कुल मिलाकर मानवता भी लाभान्वित होती है। लैंगिक समानता का अर्थ एक ऐसी स्थिति से है जिसमें प्रत्येक स्तर पर स्त्री और पुरुष के साथ समान व्यवहार किया जाए। लैंगिक समानता वाले समाज में पुरुष और स्त्री दोनों को यह स्वतंत्रता है कि वे अपनी इच्छानुसार और प्रतिष्ठा के आधार पर अपना काम करें। सरल शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि लैंगिक समानता तब प्राप्त होती है जब स्त्रियाँ गरिमा के साथ जीवन व्यतीत करें और जीवन को नियंत्रित करने के लिए अपनी स्वतंत्रता को घर या बाहर समान रूप से भोग सकें। ऐसी सकारात्मक स्थिति से ही महिलाएँ राजनीतिक रूप से सशक्त हो सकती है और वे राष्ट्र की भूमिका में अपना अमूल्य योगदान दे सकती हैं। महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी महत्वता इस बात पर निर्भर करती है नीतियाँ केवल महिलाओं के लिए सैद्धान्तिक रूप से नहीं बने बल्कि व्यावहारिक रूप से राजनीतिक व्यवस्था में उनकी आवाज को भी तवज्जो मिले। लैंगिक समानता के लिए संवैधानिक प्रतिबद्धता के बावजूद भारतीय महिलाओं में जड़ जमाए सामाजिक मानदण्डों, सांस्कृतिक प्रथाओं और प्रणालीगत भेदभाव के कारण राजनीतिक क्षेत्र में महिलाओं को व्यापक स्तर पर बाधाओं का सामना करना पड़ता है।

लेखक
डाॅ. संतोष कुमार सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग, रानी धर्म कुँवर राजकीय महाविद्यालय दल्लावाला - खानपुर, हरिद्वार (उत्तराखण्ड)।
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2025.17.04.1

Price: 251

डिजिटल इंडिया और वसुधैव कुटुम्बकम् : मानव-केंद्रित वैश्विक व्यवस्था के लिए लोक प्रशासन की पुनर्संकल्पना

By: जनक सिंह मीना , मीनाक्षी

Page No : 14-31

सार
इक्कीसवीं सदी में लोक प्रशासन एक नए परिवर्तन से गुजर रहा है- पारंपरिक पदानुक्रमित नौकरशाही से भागीदारीपूर्ण, प्रौद्योगिकी संचालित और नैतिक रूप से आधारित शासन की ओर बढ़ रहा है। भारत का डिजिटल इंडिया मिशन इस परिवर्तन का उत्कृष्ट उदाहरण है, जो प्रशासनिक सुधार को तकनीकी नवाचार के साथ एकीकृत करता है। परंतु यह केवल एक तकनीकी कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह वसुधैव कुटुम्बकम् की सभ्यतागत भावनाकृ“विश्व को एक परिवार मानने” के दृष्टिकोण को भी मूर्त रूप देता है। यह शोधपत्र तर्क प्रस्तुत करता है कि डिजिटल इंडिया और वसुधैव कुटुम्बकम् का संगम शासन की एक नई परिकल्पना प्रस्तुत करता है- जो मानव-केंद्रित, समावेशी और मूल्याधारित है दक्षता और करूणा, नवाचार और नैतिकता के समन्वय के माध्यम से भारत का डिजिटल मॉडल दर्शाता है कि प्रशासनिक आधुनिकीकरण वैश्विक सहयोग और नैतिक उत्तरदायित्व के साथ सह-अस्तित्व में रह सकता है। इंडिया स्टैक, जैम ट्रिनिटी, MyGov और प्रधानमंत्री ग्रामीण डिजिटल साक्षरता अभियान जैसी पहलें इस आदर्श को साकार करती हैं, जो अभिगम्यता, जवाबदेही और नागरिक सहभागिता को प्रोत्साहित करती हैं। न्यू पब्लिक मैनेजमेंट और डिजिटल एरा गवर्नेंस की बहसों के संदर्भ में, भारत का यह दृष्टिकोण वैश्विक लोक प्रशासन को एक नैतिक और सहानुभूतिपूर्ण प्रतिमान प्रदान करता है।

लेखक
प्रोफेसर (डॉ.) जनक सिंह मीना, प्रोफेसर, गाँधीवादी विचार एवं शांति अध्ययन विभाग समाज विज्ञान संस्था, गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय, कुन्ढेला, गुजरात।
मीनाक्षी, शोधार्थी, गाँधीवादी विचार एवं शांति अध्ययन विभाग समाज विज्ञान संस्था, गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय, कुन्ढेला, गुजरात।
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2025.17.04.2

Price: 251

भारत में बाल श्रम उन्मूलन हेतु किए गए संवैधानिक एवं विधिक प्रावधान

By: निधि लोधी , कविराज

Page No : 32-51

सार
बालश्रम एक विश्वव्यापी समस्या के साथ साथ मौलिक मानवाधिकारों का उल्लंघन भी है। यह बच्चों के विकास में बाधा उत्पन्न करता है, जिसका प्रभाव बच्चों पर शारीरिक और मानसिक रूप से पड़ता है। बालश्रम की समस्या प्राचीन काल से किसी-न-किसी रूप से विद्यमान रही है। यह समस्या औद्योगीकरण और नगरीकरण के विकास के साथ वर्तमान समय में विकराल रूप धारण करती जा रही है। बाल श्रम की समस्या केवल आर्थिक शोषण की अभिव्यक्ति नहीं करता अपितु यह सामाजिक विकास में अवरोध पैदा करके अन्य समस्याओं को जन्म देता है। विश्व में लगभग सभी देश बाल श्रम उन्मूलन के लिए सरकारी व गैर सरकारी प्रयास कर रहे हैं, फिर भी बाल श्रम की समस्या निरंतर बनी हुई है। भारत में बाल श्रम की समस्या को बाल श्रम अधिनियम 1986 और राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना द्वारा संबोधित किया जाता है। आज भारत में 10.12 मिलियन से अधिक बच्चे हैं जो स्कूल जाने और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करने के बजाय अपना बचपन कालीन बुनाई, बीड़ी बनाने, घरेलू श्रम, कृषि, आतिशबाजी और परिधान निर्माण और अनगिनत अन्य व्यवसायों को सीखने में बिता रहे हैं। इस पृष्ठभूमि में प्रस्तुत शोध पत्र में भारत में बाल श्रम की समस्या, बंधुआ बाल श्रम, बाल श्रम के परिणाम और शोषण का विश्लेषण किया गया है। भारत में बाल श्रम की स्थित के बारे में बताया गया है। अंत में, यह शोध पत्र मुख्य रूप से बाल श्रम की रक्षा के लिए भारत सरकार की नीतिगत पहलों और भारत में बालश्रम उन्मूलन के लिए किये गए संवैधानिक एवं विधिक प्रावधान पर केंद्रित है।

लेखक
निधि लोधी, शोध छात्रा, राजनीति विज्ञान विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ।
प्रोफेसर कविराज, आचार्य, राजनीति विज्ञान विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ।
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2025.17.04.3

Price: 251

भारतीय लोकतंत्रा में चुनाव सुधारः निष्पक्ष और पारदर्शी चुनावों की दिशा में उठाए गए कदम

By: रोहित कुमार , हेत राम ठाकुर

Page No : 52-65

सार
भारतीय लोकतंत्र का सशक्तिकरण, स्थायित्व और सफलता का आधार स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया पर टिका है, जो जनता की इच्छा और संप्रभुता का प्रतिनिधित्व करता है। लेकिन समय के साथ चुनावी प्रक्रिया में धन, अपराध, जातिवाद और धार्मिक ध्रुवीकरण जैसी चुनोतियों ने लोकतंत्र की शुद्धता को प्रभावित किया है। इन समस्याओं से निपटने के लिए चुनाव सुधारों की आवश्यकता महसूस की गयी, ताकि लोकतान्त्रिक प्रक्रिया की शुद्धता और पारदर्शिता बनी रहे। इस शोध पत्र में उन सुधारों का विश्लेषण किया गया है, जो भारत में निष्पक्ष चुनावों और पारदर्शिता की स्थापना की दिशा में उठाए गए हैं, जैसे ईवीएम और वीवीपैट का उपयोग, चुनाव आयोग की स्वायत्ता को सुदृढ़ करना, आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों पर प्रतिबन्ध, चुनावी खर्च और धनबल पर नियंत्रण तथा मतदाता जागरूकता बढ़ाने का प्रयास आदि शामिल हैंप् साथ ही यह अध्ययन वर्तमान सुधारों की प्रभावशीलता और भविष्य में संभावित सुधारों की आवश्यकता पर भी विचार करता है। निष्कर्षतः भारतीय लोकतंत्र की मजबूती और उसकी साख को बनाए रखने के लिए चुनाव सुधारों की सतत् प्रक्रिया अति आवश्यक है, जिससे लोकतंत्र और अधिक समावेशी, विश्वसनीय और पारदर्शी बन सके।

लेखक
रोहित कुमार, शोधार्थी राजनीति विज्ञान, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला (हि. प्र.)।
डॉ. हेत राम ठाकुर, सहायक प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, क्षेत्रीय इकाई, धर्मशाला (हि. प्र.)।
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2025.17.04.4

Price: 251

भारत-नेपाल संबंधों के विशेष संदर्भ में भारत की पड़ोसी नीति का मूल्यांकन

By: किरण अग्रवाल

Page No : 66-83

सार
यह शोधपत्र भारत की पड़ोसी नीति के परिप्रेक्ष्य में भारत-नेपाल संबंधों के ऐतिहासिक विकास, कूटनीतिक दृष्टिकोणों और रणनीतिक प्राथमिकताओं का विश्लेषण करता है। भारत की विदेश नीति में नेपाल एक महत्त्वपूर्ण पड़ोसी देश रहा है, जिसके साथ भारत ने ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक संबंध साझा किए हैं। यह अध्ययन नेहरू से लेकर गुजराल तक के विभिन्न प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में नेपाल के प्रति अपनाई गई नीतियों का तुलनात्मक अवलोकन प्रस्तुत करता है। शोध में यथार्थवाद, उदारवाद और सीमावर्ती कूटनीति जैसे सैद्धांतिक दृष्टिकोणों के माध्यम से भारत-नेपाल संबंधों की बहुआयामी प्रकृति को स्पष्ट किया गया है। यह भी दर्शाया गया है कि कैसे बाह्य शक्तियों का प्रभाव, आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता और रणनीतिक चुनौतियाँ इन संबंधों को प्रभावित करती रही हैं। शोध का निष्कर्ष यह है कि भारत की नेपाल नीति को दीर्घकालिक स्थिरता, समता और विश्वास के आधार पर पुनःसंरचित करने की आवश्यकता है।

लेखक
डॉ. किरण अग्रवाल, वाइस प्रिंसिपल, चौधरी सूरज सिंह ज़िला पंचायत इंटर कॉलेज, जागीर, मैनपुरी, उत्तर प्रदेश।
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2025.17.04.5

Price: 251

उच्च शिक्षा में भारतीय शिक्षा नीति में संक्रमण

By: सुजीत कुमार चौधरी

Page No : 84-94

सार
भारतीय उच्च शिक्षा हमेशा से ही शिक्षा नीतियों का केंद्र रही है। भारत प्राचीन काल से ही शिक्षा के केंद्र के रूप में जाना जाता रहा है और यहाँ नालंदा, विक्रमशिला जैसे और अन्य कई विश्वविद्यालय रहे हैं जिनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। दुनिया भर के विद्वान यहाँ अध्ययन करने आते थे। हालाँकि, समय बीतने और बाहरी शासकों के आगमन के साथ, ये संस्थान उच्च शिक्षा के शिक्षण केंद्र के रूप में नष्ट हो गए। ब्रिटिश काल से लेकर स्वतंत्र भारत तक उच्च शिक्षा को पुनर्जीवित करने के लिए विभिन्न शैक्षिक नीतियाँ स्थापित की गईं। नीति निर्माण की इस श्रृंखला में, हाल ही में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 आई। इस लेख में राधाकृष्णन आयोग से लेकर एनईपी 2020 तक उच्च शिक्षा पर प्रमुख नीतियों का विश्लेषण किया गया है।

लेखक
प्रोफेसर सुजीत कुमार चौधरी, अध्यक्ष समाजशास्त्र विभाग, महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, बिहार।
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2025.17.04.6

Price: 251

बिना विवाह संस्कार के सह-जीवनः भारतीय समाज और कानूनी परिप्रेक्ष्य में लिव-इन रिलेशनशिप का विश्लेषण

By: आशा

Page No : 95-108

सार
यह अध्ययन भारत में सह-जीवन संबंधों की विकसित होती प्रवृत्ति का समालोचनात्मक विश्लेषण करता है, जिसकी ऐतिहासिक जड़ें प्राचीन सहमति-आधारित विवाहों जैसे गंधर्व विवाह में निहित हैं। भारत में तीव्र शहरीकरण, वैश्वीकरण और बदलते लैंगिक मानदंडों के बीच, सह-जीवन संबंध पारंपरिक विवाह का एक वैकल्पिक रूप बनकर उभरे हैं, जो बढ़ती व्यक्तिगत स्वायत्तता और सांस्कृतिक दृष्टिकोणों में परिवर्तन को दर्शाते हैं। यद्यपि इन संबंधों के प्रचलन में वृद्धि हो रही है, फिर भी ये कानूनी रूप से अस्पष्ट और सामाजिक रूप से विवादास्पद बने हुए हैं, विशेषकर क्षेत्रीय और पीढ़ीगत विविधताओं के संदर्भ में। ऐतिहासिक न्यायिक हस्तक्षेपों ने कुछ हद तक कानूनी सुरक्षा प्रदान की है, फिर भी एक समर्पित विधिक ढाँचे की अनुपस्थिति में ऐसे संबंधों में रहने वाले-विशेष रूप से महिलाएँ और बच्चे-असुरक्षा के शिकार होते हैं। यह शोध परंपरा और आधुनिकता के बीच जटिल अंतर्क्रिया को रेखांकित करता है, जो भारत में अंतरंग साझेदारियों को आकार दे रही है, और व्यापक विधिक सुधार, जन-जागरूकता तथा समावेशी नीतिगत उपायों की आवश्यकता को रेखांकित करता है। अंततः, सह-जीवन संबंध भारत के व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तन का प्रतीक हैं, जो रूढ़िवादी मान्यताओं को चुनौती देते हुए विविध पारिवारिक संरचनाओं में पहचान, समानता और गरिमा की वकालत करते हैं।

लेखक
डाॅ. आशा, सीनियर साइंटिस्ट, छत्तीसगढ़ ऐक्शन रिसर्च टीम (कार्ट), रायपुर, छत्तीसगढ़।
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2025.17.04.7

Price: 251

पारंपरिक भारतीय मौसम पूर्वानुमान तकनीक की वैज्ञानिकता एवं प्रासंगिकता की समीक्षाः भारतीय ज्ञान परंपरा में एक अध्ययन

By: शशि भूषण

Page No : 109-125

सार
मौसम के विविध स्वरूपों का हमारे पर्यावरण पर बहुविध प्रभाव पड़ता है, जिससे हमारी अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होती है। आगामी मौसम के बारे में समय रहते ही जानकारी हो जाने पर भविष्य में पर्यावरण एवं अर्थव्यवस्था संबंधी योजनाएँ पहले से ही बनाई जा सकती हैं। इसलिए मौसम का पूर्वानुमान काफी लाभप्रद एवं महत्त्वपूर्ण होता है। भारतीय परंपराओं में मौसम के ऐसे पूर्वानुमान के अत्यंत ही विकसित तकनीकों की व्यापकता एवं प्रचुरता है, जिसका कारण यह है कि भारतीय सभ्यता सुदीर्घ काल से निरन्तर प्रवाहमान रही है। काल के इस लम्बे अंतराल में हुए अनुभवों एवं प्रकृति की प्रयोगशाला में नित्य किए गए प्रयोगों पर आधारित ज्ञान ने भारतवंशियों को अत्यंत ही दक्ष मौसम वैज्ञानिक बना दिया है। प्रस्तुत शोध-पत्र में मौसम के पूर्वानुमान से संबंधित पारंपरिक भारतीय तकनीकों एवं आधुनिक पाश्चात्य पद्धतियों के तुलनात्मक विश्लेषण के आधार पर इस तथ्य को स्थापित किया गया है कि आधुनिक पाश्चात्य पद्धतियों पर आधारित प्रायः ही अपूर्ण, भ्रामक, अशुद्ध, अवास्तविक तथा अविश्वसनीय परिणामों के मुकाबले पारंपरिक भारतीय तकनीकों पर आधारित परिणाम प्रायः ही पूर्ण, सत्य, शुद्ध, वास्तविक, अधिकृत तथा विश्वसनीय होते हैं। पशु-पक्षियों के व्यवहार, हवाओं की दिशा, आकाश के रंग तथा पेड़-पौधों के परिवर्तनों आदि के आधार पर पारंपरिक भारतीय मौसम वैज्ञानिक आगामी मौसम की सटीक भविष्यवाणी करते रहे हैं। ऐसी हजारों-हजार तकनीकें संपूर्ण भारतवर्ष के ग्रामीण अंचलों में बिखरे पड़े हैं, जिनमें से कुछ, यथा- गौरैया का धूल में लेटना, बया पक्षी के घोसलों के प्रवेश द्वार की दिशा, घाघ भड्डरी की कहावतें अथवा लोकोक्तियाँ, महावीरी पताका या ध्वजा (हवाओं की दिशा ज्ञात करने का प्राचीन धार्मिक भारतीय उपकरण) एवं महाकवि कालिदास कृत मेघदूत में दक्षिण-पश्चिम मानसून के गमन पथ के भौगोलिक विश्लेषण के माध्यम से पारंपरिक भारतीय मौसम पूर्वानुमान तकनीक की वैज्ञानिकता एवं प्रासंगिकता की समीक्षा की गयी है।

लेखक
डॉ. शशि भूषण, वैज्ञानिक, पर्यावरण शोध एवं ग्रामीण विकास संस्थान, पटना।
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2025.17.04.8

Price: 251

पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विश्व शांति संबंधी विचारों का अध्ययन

By: राजबीर सिंह दलाल , सुनील कुमार

Page No : 126-143

सार
पंडित दीनदयाल उपाध्याय (1916-1968) एक दार्शनिक, अर्थशास्त्री और राजनेता थे, जिनकी एकात्म मानववाद और अंत्योदय (अंतिम व्यक्ति का उत्थान) की विचारधाराएँ वैश्विक शांति और न्यायसंगत विकास के लिए एक वैकल्पिक मॉडल पेश करती हैं। पश्चिमी पूंजीवाद और माक्र्सवादी समाजवाद दोनों को अस्वीकार करते हुए, उपाध्याय ने एक विकेंद्रीकृत, सांस्कृतिक रूप से निहित आर्थिक प्रणाली की वकालत की, जो आध्यात्मिक कल्याण के साथ भौतिक प्रगति का सामंजस्य स्थापित करती है। एकात्म मानववाद व्यक्तिगत और सामाजिक कल्याण के बीच संतुलन पर जोर देता है, जबकि अंत्योदय हाशिए पर पड़े लोगों को सशक्त बनाने पर ध्यान केंद्रित करता है। इस शोधपत्र में यह जाँचने का प्रयास किया गया है कि ये सिद्धांत संघर्ष समाधान, गरीबी उन्मूलन और पारिस्थितिक स्थिरता में कैसे योगदान करते हैं तथा आज की ध्रुवीकृत दुनिया में इसकी प्रासंगिकता क्यों और कितनी हैं? भारत सरकार की पंडित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों पर आधारित अंत्योदय अन्न योजना (AAY) जैसी कल्याणकारी योजनाओं का विश्लेषण करके और उनके विचारों की तुलना गांधीवादी, बौद्ध दर्शन तथा पाश्चात्य दृष्टिकोणों से करके, यह शोध समावेशी विकास, सामाजिक न्याय और सांस्कृतिक सद्भाव के माध्यम से वैश्विक शांति को बढ़ावा देने में उनकी क्षमता पर प्रकाश डालने का एक लघु प्रयास है।

लेखक
प्रोफेसर (डॉ.) राजबीर सिंह दलाल, विभागाध्यक्ष, राजनीति विज्ञान विभाग, चौधरी देवी लाल विश्वविद्यालय, सिरसा (हरियाणा)।
सुनील कुमार, शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, चौधरी देवी लाल विश्वविद्यालय, सिरसा (हरियाणा)।
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2025.17.04.9

Price: 251

वैश्विक पर्यावरणीय मुद्दे

By: रिंकी

Page No : 144-158

लेखक
डॉ. रिंकी, प्राध्यापक, दिल्ली विश्वविद्यालय।
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2025.17.04.10

Price: 251

भारत में महिला आरक्षणः अतीत से वर्तमान तक का सिंहावलोकन

By: जितेन्द्र कुमार मीना , राजकुमार गर्ग

Page No : 159-173

सार
यह शोध पत्र ’’भारत में महिला आरक्षण: अतीत से वर्तमान तक का सिंहावलोकन’’ भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिए किए गए विविध ऐतिहासिक, कानूनी और सामाजिक प्रयासों का व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। शोध में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उठे आरक्षण के प्रारंभिक विचारों से लेकर हाल के वर्षों में पारित 106वें संविधान संशोधन विधेयक तक की यात्रा को विस्तार से समझाया गया है। इसमें महिला आरक्षण से जुड़ी प्रमुख वैधानिक पहलें, राजनीतिक दलों की भूमिका, सामाजिक-सांस्कृतिक चुनौतियाँ, तथा पंचायत से लेकर संसद तक महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का विश्लेषण किया गया है। शोध पत्र यह भी रेखांकित करता है कि प्रभावी आरक्षण व्यवस्था ने न सिर्फ महिलाओं की उपस्थिति को बढ़ाया, बल्कि महिला सशक्तिकरण, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक समावेशन को भी नई दिशा दी है। अंत में, यह कार्यान्वयन संबंधी बाधाओं व संभावनाओं पर विचार करते हुए भविष्य में महिला आरक्षण को दिशा प्रदान करता है।

लेखक
जितेन्द्र कुमार मीना, शोधार्थी, लोक प्रशासन विभाग, राजकीय कला महाविद्यालय, कोटा (राजस्थान)।
डॉ. राजकुमार गर्ग, आचार्य, लोक प्रशासन विभाग, राजकीय कला महाविद्यालय, कोटा (राजस्थान)।
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2025.17.04.11

Price: 251

Instruction to the Author

आलेख में सामग्री को इस क्रम में व्यवस्थित करेंः आलेख के शीर्षक, लेखकों के नाम, पते और ई-मेल, लेखकों का परिचय, सार संक्षेप, (abstract) संकेत शब्द, परिचर्चा, निष्कर्ष/सारांश, आभार (यदि आवश्यक हो तो) और संदर्भ सूची । 

सारसंक्षेपः सारसंक्षेप (abstract) में लगभग 100-150 शब्द होने चाहिए, तथा इसमें आलेख के मुख्य तर्को का संक्षिप्त ब्यौरा हो। साथ ही 4-6 मुख्य शब्द (Keywords) भी चिन्हित करें । 

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टाइपः कृपया अपना आलेख टाइप करके वर्ड और पीडीएफ दोनों ही फॉर्मेट में भेजे । टाइप के लिए हिंदी यूनिकोड का इस्तेमाल करें, अगर आपने हिंदी के किसी विशेष फ़ॉन्ट का इस्तेमाल किया हो तो फ़ॉन्ट भी साथ भेजे, इससे गलतियों की सम्भावना कम होगी, हस्तलिखित आलेख स्वीकार नहीं किए जाएंगे। 

अंकः सभी अंक रोमन टाइपफेस में लिखे। 1-9 तक के अंको को शब्दों में लिखें, बशर्ते कि वे किसी खास परिमाण को न सूचित करते हो जैसे 2 प्रतिशत या 2 किलोमीटर। 

टेबुल और ग्राफः टेबुल के लिए वर्ड में टेबुल बनाने की दी गई सुविधा का इस्तेमाल करें या उसे excel में बनाएं। हर ग्राफ की मूल एक्सेल कॉपी या जिस सॉफ़्टवेयर मैं उसे तैयार किया गया हो उसकी मूल प्रति अवश्य भेजे  सभी टेबुल और ग्राफ को एक स्पष्ट संख्या और शीर्षक दें। आलेख के मूल पाठ में टेबुल और ग्राफ की संख्या का समुचित जगह पर उल्लेख (जैसे देखें टेबुल 1 या ग्राफ 1) अवश्य करें। 

चित्राः सभी चित्र का रिजोलुशन कम से कम 300 डीपीआई/1500 पिक्सेल होना चाहिए। अगर उसे कही और से लिया गया हो तो जरूरी अनुमति लेने की जिम्मेदारी लेखक की होगी।

वर्तनीः किसी भी वर्तनी के लिए पहली और प्रमुख बात है एकरूपता। एक ही शब्द को अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग तरीके से नहीं लिखा जाना चाहिए। इसमें प्रचलन और तकनीकी सुविधा दोनों का ही ध्यान रखा जाना चाहिए।

• नासिक उच्चारण वाले शब्दों में आधा न् या म् की जगह बिंदी/अनुस्वार का प्रयोग करें। उदाहरणार्थ, संबंध के बजाय संबंध, सम्पूर्ण की जगह संपूर्ण लिखें। 

• अनुनासिक उच्चारण वाले शब्दों में चन्द्रबिन्दु का प्रयोग करें। मसलन, वहाँ, आये , जाएंगे, महिलाएं, आदि-आदि। कई बार सिर्फ बिंदी के इस्तेमाल से अर्थ बदल जाते हैं। इसलिए इसका विशेष ध्यान रखें, उदाहरण के लिए हंस और हँस। 

• जहाँ संयुक्ताक्षरों मौजूद हों और प्रचलन में हों वहाँ उन संयुक्ताक्षरों का भरसक प्रयोग करें। 

• महत्व और तत्व ही लिखें, महत्व या तत्व नहीं। 

• जिस अक्षर के लिए हिंदी वर्णमाला में अलग अक्षर मौजूद हो, उसी अक्षर का प्रयोग करें। उदाहरण के लिए, गए गयी की जगह गए, गई लिखें। 

• कई मामलों में दो शब्दों को पढ़ते समय मिलाकर पढ़ा जाता है उन्हें एक शब्द के रूप् में ही लिखें। उदाहरण के लिए, घरवाली, अखबारवाला, सब्जीवाली, गाँववाले, खासकर, इत्यादि। 

• पर कई बार दो शब्दों को मिलाकर पढ़ते के बावजूद उन्हें जोड़ने के लिए हाइफन का प्रयोग होता है। खासकर सा या सी और जैसा या जैसी के मामले में। उदाहरण के लिए,एक-सा, बहुत-सी, भारत-जैसा, गांधी-जैसी, इत्यादि। 

• अरबी या फारसी से लिए गए शब्दों में जहाँ मूल भाषा में नुक्ते का इस्तेमाल होता है। वहाँ नुक्ता जरूर लगाएं। ध्यान रहें कि क, ख, ग, ज, फ वाले शब्दों में नुक्ते का इस्तेमाल होताहै। मसलन, कलम, कानून, खत, ख्वाब, खैर, गलत, गैर इलरजत, इजाफा, फर्ज, सिर्फ। 

उद्धरणः पाठ के अंदर उद्धृत वाक्यांशों को दोहरे उद्धरण चिह्न (’ ’) के अंदर दें। अगर उद्धृत अंश दो-तीन वाक्यों से ज्यादा लंबा  हो तो उसे अलग पैरा में दें। ऐसा उद्धृत पैराग्राफ अलग नजर आए इसके लिए उसके पहले बाद में एक लाइन का स्पेस दें और पूरा पैरा को इंडेंट करें और उसके टाइप साईज को छोटा रखें। उद्धृत अंश में लेखन की शैली और वर्तनी में कोई तबदीली या सुधार न करें । 

पादटिप्पणी और हवाला (साईटेशन):  सभी पादटिप्प्णियाँ और हवालों (साईटेशन) के लिए मूल पाठ में 1,2,3,4,..... सिलसिलेवार संख्या दे और आलेख के अंत में क्रम में दे। वेबसाईट के मामले में उस तारीख का भी जिक्र करे जब अपने उसे देखा हो। मसलन, पाठ 1, मनोरंजन महंती, 2002, पृष्ठ और हर हवाला के लिए पूरा संदर्भ आलेख के अंत में दें।

सन्दर्भ: इस सूची में किसी भी संदर्भ का अनुवाद करके न लिखें, अथार्थ संदर्भो को उनकी मूल भाषा में रहने दें। यदि संदर्भ हिंदी व अंग्रेजी दोनों भाषाओं के हो तो पहले हिन्दी वाले संदर्भ लिखें तथा इन्हें हिन्दी वर्णमाला के अनुसार, और बाद में अंग्रेजी वाले संदर्भ को अंग्रेजी वर्णमाला के अनुसार सूचीबद्ध करें । 

•ए.पी.ए. स्टाइल फोलो करें। 

•मौलिकताः ध्यान रखें कि आलेख किसी अन्य जगह पहले प्रकाशित नहीं हुआ हो तथा न ही अन्य भाषा में प्रकाशित आलेख का अनुवाद हो। यानी आपका आलेख मौलिक रूप से लिखा गया हो। 

•कोशिश होगी कि इसमें शामिल ज्यादातर आलेख मूल रूप से हिंदी में लिखे गए हो । लेखकों से अपेक्षा होगी कि वे दूसरे किसी लेखक के विचारों और रचनाओं का सम्मान करते हुए ऐसे हर उद्धरण के लिए समुचित हवाला/संदर्भ देंगे ।अकादमिक जगत के भीतर बिना हवाला दिए नकल या दूसरों के लेखन और विचारों को अपना बताने (प्लेजियरिज्म) की बढ़ती प्रवृत्ति देखते हुए लेखकों का इस बारे मे विशेष ध्यान देना होगा । 

•समीक्षा और स्वीकृतिः प्रकाशन के लिए भेजी गयी रचनाओं पर अंतिम निर्णय लेने के पहले संपादक मडंल दो समीक्षकों की राय लेगा, अगर समीक्षक आलेख मे सुधार की माँग करें तो लेखक को उन पर गौर करना होगा।

•संपादन व सुधार का अंतिम अधिकार संपादकगण के पास सुरक्षित हैं। 

•कापीराइटः प्रकाशन का कापीराइट लेखक के पास ही रहेगा पर हर रूप में उसका प्रकाशन का अधिकार आई आई पी ए के पास होगा। वे अपने प्रकाशित आलेख का उपयोग अपनी लिखी किताब या खुद संपादित किताब मे आभार और पूरे संदर्भ के साथ कर सकते हैं। किसी दूसरे द्वारा संपादित किताब में शामिल करने की स्वीकृति देने के पहले उन्हें आई आई पी ए से अनुमति लेनी होगी।
 

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