लोक प्रशासन - A UGC-CARE Listed Journal
Association with Indian Institute of Public Administration
Current Volume: 17 (2025 )
ISSN: 2249-2577
Periodicity: Quarterly
Month(s) of Publication: मार्च, जून, सितंबर और दिसंबर
Subject: Social Science
DOI: https://doi.org/10.32381/LP
संवैधानिक लोकतंत्र, लोक नीति एवं नागरिक समाजः समकालीन विमर्श
By : अभय प्रसाद सिंह’ एवं कृष्ण मुरारी
Page No: 41-56
Abstract:
संवैधानिक भारतीय लोकतंत्र ने विधिक और सार्वजनिक संस्थाओं की कुछ रचात्नामक और कुछ नियंत्रण-उन्मुखी औपनिवेशिक विरासत के साथ उत्तर-औपनिवेशिक गणतंत्र का सफर शुरू किया। संहिताबद्ध कानून, नौकरशाही और संख्या की राजनीति लोकतांत्रिक व् नीति प्रक्रियाओं की औपनिवेशिक विरासत के कुछ प्रतिगामी पहलू हैं जिसके परिणामस्वरूप आज तक भ्रष्टाचार एवं जातिगत और अन्य पहचान की राजनीति प्रचलन में है। हालाँकि, सरकार, न्यायपालिका, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और रोजगार की आधुनिक संस्थाओं ने भारत में परिवर्तनकारी लोकतांत्रिक फल्क्रम के रूप में काम किया है। आंदोलनों से उत्पन्न राजनीतिक दलों ने लोकतांत्रिक नीति प्रक्रिया को सार्वजनिकता प्रदान की और धीरे-धीरे भारतीय लोकतंत्र को अधिक से अधिक प्रतिनिध्यात्मक और सहभागी बना दिया। सामाजिक और नए सामाजिक आंदोलनों, गैर-सरकारी संगठनों, मीडिया, बाजार और शिक्षित मध्यम वर्ग जैसे नागरिक समाज के घटक ने भी लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं को सृजनात्मक रूप से बदल दिया है और भारतीय लोकतंत्र को अधिक जवाबदेह और पारदर्शी बना दिया है। लोक कल्याण के निमित्त लोक सेवा प्रदायगी अभिकरणों एवं लोक नियामक संस्थाओं की महत्ती भूमिका ने भारतीय लोकतंत्र को वैश्विक लोकतान्त्रिक विश्व में एक विशिष्ट स्थान प्रदान किया है । बहरहाल, जातिवाद, नक्सलवाद, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और कृषि संकट जैसी चुनौतियाँ भारतीय लोकतंत्र में नीति विमर्श के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ प्रस्तुत कर रहे हैं।
Authors:
अभय प्रसाद सिंह: प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग, पी.जी.डी.ए.वी. महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय
कृष्ण मुरारी: असिस्टेंट प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग, शहीद भगत सिंह महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय
DOI: https://doi.org/10.32381/LP.2023.15.03.3