लोक प्रशासन - A UGC-CARE Listed Journal
Association with Indian Institute of Public Administration
Current Volume: 17 (2025 )
ISSN: 2249-2577
Periodicity: Quarterly
Month(s) of Publication: मार्च, जून, सितंबर और दिसंबर
Subject: Social Science
DOI: https://doi.org/10.32381/LP
राजनीतिक दलो को प्राप्त सार्वजनिक वित्तपोषण का तुलनात्मक विश्लेषणः लोकतंत्रा पर इसके प्रभाव का वैश्विक और भारतीय परिप्रेक्ष्य से अध्ययन
By : शिखा ओझा, प्रो. रिपु सूदन सिंह
Page No: 90-108
सार
धन किसी भी लोकतन्त्र का एक आवश्यक घटक है। राजनीतिक दलों द्वारा चुनावी अभियान करने, जन संपर्क स्थापित करना, राजनीतिक भागीदारी और प्रतिनिधित्व को सक्षम बनाता है। राजनीतिक दलों को राजनीतिक प्रक्रिया में अपनी भूमिका निभाने हेतु धन की आवश्यकता होती है। यदि इसे प्रभावी ढंग से विनियमित न किया जाए तो राजनीतिक प्रक्रियाओं, संस्थाओं की अखंडता को कमजोर कर सकता है। राजनीति में धन से संबंधित अनेक समस्याएं: वित्तीय घोटाले, सार्वजनिक धन का दुरुपयोग, निजी निगमों द्वारा पार्टी के नेताओं को भारी मात्रा में धन देना, क्रोनी कैपिटलिज्म को बढ़ावा। राजनीतिक दलों को प्राप्त वित्तपोषण स्रोतांे में पारदर्शिता की कमी राजनीतिक संस्थानों के प्रति अविश्वास में वृद्धि और जवावदेही को कम करती है। एक स्वस्थ लोकतन्त्र का मानक नागरिक केन्द्रित होना है। लोकतन्त्र की स्थिरता हेतु पारदर्शी, जवाबदेह, और समावेशी लोकतन्त्र की आवश्यकता होती है - जो सही मायने में जन प्रतिनिधित्व कर सकें। नियमों विनियमों के माध्यम से इन चुनौतियों से निपटने के प्रयास अक्सर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के साथ कमजोर हो जाते हैं। यह शोध पत्र विश्व के अन्य देशों में विधमान सार्वजनिक सब्सिडी, राजनीतिक वित्त विनियमों का विश्लेषण करके, प्रत्येक विनियमन और चुनौतियों की वर्तमान स्थिति का आकलन करते हुए, विशेष रूप से भारत के राजनीतिक वित्त व्यवस्था को समझते हुए और पहचानी गई कमियों से निपटने हेतु कई सिफारिशें प्रदान करता है।
लेखक
शिखा ओझा, शोध छात्रा, राजनीति विज्ञान विभाग, बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय लखनऊ।
प्रो. रिपु सूदन सिंह, प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग, बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय लखनऊ।
DOI: https://doi.org/10.32381/LP.2025.17.02.7