लोक प्रशासन - A UGC-CARE Listed Journal

Association with Indian Institute of Public Administration

Current Volume: 17 (2025 )

ISSN: 2249-2577

Periodicity: Quarterly

Month(s) of Publication: मार्च, जून, सितंबर और दिसंबर

Subject: Social Science

DOI: https://doi.org/10.32381/LP

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ग्रामीण लोक केंद्रित व्यवस्था हेतु पुरा-परियोजना की संकल्पनाः आशा एवं निराशा

By : सुशांत यादव

Page No: 151-161

Abstract:
कोरोना महामारी जैसे वैश्विक संकट से आज पूरा विश्व भयभीत है और इसके दुष्परिणामों को विश्व के तमाम देशों के साथ भारत भी झेल रहा है। महामारी के इस माहौल में सबसे ज़्यादा प्रभावित होने वाली संख्या गरीब व्यक्तियों की हैं। जिनका अधिसंख्य मूल निवास भारत के गाँवों में हैं। इस परिप्रेक्ष्य में भारत के पूर्व राष्ट्रपति और प्रसिद्ध वैज्ञानिक ए.पी.जे अब्दुल कलाम का मानना था कि गाँवों में बसे व्यक्तियों को समाहित किए बग़ैर हम भारत की पूर्ण तस्वीर का निर्माण नहीं कर सकते हैं। अतः विकास से संबंधित किसी भी नीति का निर्माण इस तथ्य को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए कि, वह ग्रामीण भारत की आवश्यकता को किस हद तक पूर्ण कर सकता है। अगर वह नीति इन अधिसंख्य भारतीयों की आवश्यकता को स्वयं में समाहित नहीं करती तो नीति निर्माण संस्थानों को इस पर पुनर्विचार करना चाहिए। गांवों का सामाजिक-राजनीतिक जीवन दर्शन महात्मा गांधी के आत्मनिर्भर एवं स्वायत्त गांवों की संकल्पना से लेकर ए.पी.जे अब्दुल कलाम की पुरा (प्रोविज़न आफ अर्बन एमेनीटिज़ टू रूरल एरियाज.) परियोजना तक भारत के ग्रामीण समाज के सामाजिक राजनीतिक जीवन में अनेक परिवर्तन देखने को मिलते हैं। वैसे तो आत्मनिर्भरता की अवधारणा एवं पुरा परियोजना की संकल्पना दोनों ही विशुद्ध अर्थशास्त्रीय संकल्पनाएँ हैं, परन्तु समाज का अर्थशास्त्र, समाज एवं समाज की राजनीति दोनों को अपरिहार्य रूप से प्रभावित करती है। इसी अर्थशास्त्र के कारण गावों का समाज एवं इसकी राजनीति हमेशा से अद्वितीय एवं अनोखा चित्र प्रस्तुत करते आये हैं। उपर्युक्त आलेख में गाँव-शहर के इसी सम्बंधों पर कलाम के पुरा परियोजना की अवधारणा से समबंधित विचारों और पहलुओं का मूल्याँकन प्रस्तुत किए जाने का प्रयास किया गया है।|

Author
सुशांत यादव: कृषक स्नातकोत्तर महाविद्यालय, मवाना (मेरठ, उ.प्र.) 
 

DOI: https://doi.org/10.32381/LP.2023.15.03.10

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