लोक प्रशासन - A UGC-CARE Listed Journal
Association with Indian Institute of Public Administration
Current Volume: 17 (2025 )
ISSN: 2249-2577
Periodicity: Quarterly
Month(s) of Publication: मार्च, जून, सितंबर और दिसंबर
Subject: Social Science
DOI: https://doi.org/10.32381/LP
लैंगिक न्याय एंव पुलिस प्रशासन
By : शिवानी सिंह
Page No: 39-54
Abstract
"नार्यस्तु राष्ट्रस्य स्वः," स्त्री राष्ट्र का भविष्य होती है। एक राष्ट्र के निर्माण में महिलाओं की भूमिका अतुलनीय है। भारतीय संविधान ने पुरुषों और महिलाओं के बीच समानता का अधिकार प्रदान किया है। समाज में कानून एवं व्यवस्था बनाये रखने के लिए पुलिस बल की व्यवस्था की गई है। पुलिस बल में महिलाओं की आवश्यकता उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी पुरुषों की है। पिछले कुछ वर्षों में पुलिस बल में महिलाओं की स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन आये हैं किंतु ये परिवर्तन पर्याप्त नहीं हैं। आज हम 21वीं सदी में प्रवेश कर चुके हैं और इस युग की महिलाएं हर क्षेत्र में अपना परचम लहरा रही हैं। अब वह रूढ़ीवादी परम्पराओं, सामाजिक कुरीतियों और पितृसत्तात्मक का खुलकर विरोध कर रहीं हैं, लेकिन दुर्भाग्यवश वर्तमान समय में भी उनकी स्थिति दयनीय ही बनी हुई है। प्राचीन समय में पुलिस बल में महिलाओं को इसलिए प्रवेश नहीं दिया जाता था क्योंकि उन्हें कमजोर, कोमल और इस पेशे के लिए शारीरिक रूप से अनुपयुक्त माना जाता था। स्वतंत्रता के पश्चात् भी उच्च पदों (आई.पी.एस) पर प्रवेश के लिए दशकों लग गए। तत्पश्चात् 1973 में किरण बेदी ने अपने अथक प्रयास और संघर्ष के बाद उच्च पदों पर महिलाओं के प्रवेश का मार्ग प्रशस्त किया। विशेष रूप से पुलिस विभाग में महिलाओं की स्थिति का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या में 48.5 प्रतिशत महिलाएं हैं। 2022 में ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट की रिपोर्ट के अनुसार राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों में कुल दो लाख 15 हजार 504 महिला पुलिस कर्मचारी है जो संपूर्ण पुलिस बल का मात्र 10.03 प्रतिशत ही है।
Author
शिवानी सिंह, शोध छात्रा, लोक प्रशासन विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ।
DOI: https://doi.org/10.32381/LP.2024.16.04.4