लोक प्रशासन - A UGC-CARE Listed Journal

Association with Indian Institute of Public Administration

Current Volume: 17 (2025 )

ISSN: 2249-2577

Periodicity: Quarterly

Month(s) of Publication: मार्च, जून, सितंबर और दिसंबर

Subject: Social Science

DOI: https://doi.org/10.32381/LP

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डॉ. अम्बेडकर की समावेशी समाज की संकल्पना: एक विश्लेषण

By : विजय शंकर चौधरी , देवेंद्र मौर्य

Page No: 102-114

Abstract
भारतीय संविधान के शिल्पकार डॉ. बी. आर. अम्बेडकर का राजनीतिक और आर्थिक प्रणाली को लेकर एक समावेशी दृष्टिकोण था, जो समाज के प्रत्येक वर्ग को इसके अंतर्गत शामिल करने एवं सशक्त करने पर जोर देता है। उनका मानना था कि राजनीतिक और आर्थिक लोकतंत्र आदर्श समाज के दो अनिवार्य घटक हैं, और दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। उनका दृढ़ मत था कि आर्थिक समानता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता अपने उद्देश्यों को प्राप्त नहीं कर पायेगी। डॉ. अम्बेडकर एक ऐसी राजनीतिक प्रणाली में विश्वास करते थे जहाँ प्रत्येक नागरिक के पास अपने देश में निर्णय लेने की प्रक्रिया में भाग लेने और योगदान करने के समान अवसर उपलब्ध हों। उन्होंने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के महत्व पर जोर दिया, जो यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक नागरिक को अपनी जाति, नस्ल, लिंग या आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना स्वतंत्र मतदान करने का अधिकार हो। समाज के वंचित तबको को निर्णय लेने की प्रक्रिया में प्रतिनिधित्व देने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की वकालत की। डॉ. अम्बेडकर एक ऐसी आर्थिक प्रणाली के समर्थक थे जो संपत्तियों और संसाधनों के समान वितरण की व्यवस्था समाज के सभी वर्गों के लिए सुनिश्चित करती है। उनका मानना था कि संसाधनों और उत्पादन के साधनों तक पहुँच सामाजिक या आर्थिक स्थिति के बजाय योग्यता पर आधारित होनी चाहिए। उन्होंने पूँजीपतियों के विकल्प के रूप में सहकारी समितियों के गठन की भी वकालत  की, जिससे कामगारों को  उत्पादन उपकरण और मशीनरी प्राप्त करने में सुगमता हो सके और साथ ही निर्णय लेने की प्रक्रिया में वे अपनी बात रख सके । अगर हम वर्तमान में देखे तो डॉ बी. आर. अम्बेडकर  जिस राजनीतिक लोकतन्त्र  की बात कर रहे थे उसे हमारे सविंधान में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार और चुनाव लड़ने की अनुमति प्रदान कर उसको  प्राप्त करने की कोशिश की गई है और निर्णय लेने की प्रक्रिया में समाज के वंचित तबकों को प्रतिनिधित्व देने के लिए लोकसभा, विधानसभा एवं स्थानीय स्वशासन के स्तर पर आरक्षण की व्यवस्था प्रदान की र्गइ  है । अगर आर्थिक समानता की  देखें तो जिस तरह से देश में सम्पतियों का असमान वितरण हो रहा है और चुनावी प्रक्रिया में पूंजी का दखल बढ़ रहा है, वह कहीं न कहीं अम्बेडकर के राजनीतिक और आर्थिक समता पर आधारित लोकतांत्रिक एवं समतामूलक समाज की स्थापना के लिए एक चुनौती उत्पन्न कर रही है ।
           प्रस्तुत आलेख डॉ. अम्बेडकर के राजनैतिक और आर्थिक समावेशी समाज के परिप्रेक्ष्य और संदर्भो पर आधारित चिंतन को व्याख्यायित करता है ।

Authors :
विजय शंकर चौधरी : 
शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी (बिहार)।
देवेंद्र मौर्य :  शोधार्थी, गाँधी एवं शांति अध्ययन विभाग, महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र)।
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DOI: https://doi.org/10.32381/LP.2024.16.01.8

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