लोक प्रशासन - A UGC-CARE Listed Journal

Association with Indian Institute of Public Administration

Current Volume: 17 (2025 )

ISSN: 2249-2577

Periodicity: Quarterly

Month(s) of Publication: मार्च, जून, सितंबर और दिसंबर

Subject: Social Science

DOI: https://doi.org/10.32381/LP

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गाँधी जी और अहिंसा का अनुसरण

By : प्रीति चाहल

Page No: 108-116

Abstract
गाँधीजी ने सत्य को ईश्वर के समकक्ष रखा है और उसे प्राप्त करने का साधन अहिंसा बताया इस अहिंसा के सकारात्मक व नकारात्मक दोनों ही रूपों की उन्होंने व्याख्या की है। नकारात्मक रूप में तो यह किसी भी जीव को पीड़ा नहीं पहुँचाना है। तो सकारात्मक रूप में यह मनुष्य को क्या करना चाहिए का निर्देश देता है। अर्थात् यह ’मानव प्रेम’ को बढ़ावा देता है। बाइबिल के वाक्यों को दोहराते प्रेम को बढ़ावा देता है। बाइबिल के वाक्यों को दोहराते हुए गाँधी कहते हैं “पाप से घृणा करे, पापी से नहीं।“ अर्थात् अपने चरित्र बल द्वारा वे विरोधियों या अन्यायियों के ’हृदय परिवर्तन’ पर बल देते हैं। अहिंसा को और भी व्यापक रूप से समझाते हुए उन्होंने कहा है कि, किसी को कष्ट पहुँचाने का विचार या किसी का बुरा चाहना भी हिंसा है। किसी के प्रति घृणा या द्वेष का भाव रखना भी हिंसा है। आवश्यकता से अधिक वस्तु ग्रहण करना तथा पर्यावरण में किसी तरह का गन्दगी या प्रदूषण फैलाना भी अहिंसा है“।
       गाँधी ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि अहिंसा निर्बल व्यक्ति का आश्रय नहीं, वरन् शक्तिशाली का अस्त्र है। विरोध के शान्ति से डर जाना या अत्याचार के विरूद्ध बल प्रयोग न कर पाना अहिंसा नहीं वरन् यह नैतिक दृष्टि से शक्तिशाली व्यक्ति या समूह का बल है जो सत्य पर दृढ़ निष्ठा से प्राप्त होता है। इसका सबसे अच्छा साधन ’सत्याग्रह’ है गाँधीजी ने कहा कि सत्याग्रही कभी पराजय स्वीकार नहीं करते। सत्य की सिद्धि कठिन तो है, परन्तु अनन्तः सत्य की ही विजय होती है - ’सत्यमेव जयते नामृताम’। इसके साथ ही गाँधीजी ने अहिंसात्मक संघर्ष और सत्याग्रह को मिलाकर ’सविनय अवज्ञा’ आंदोलन की संकल्पना को भी प्रतिपादित किया था।
         ईश्वर अथवा एक सर्वव्यापी आध्यात्मिक सत्ता में विश्वास गाँधी का मूल तत्व है। अपने जीव में वे टाल्सटाँय, रस्किन, थोरी, स्वामी विवेकानन्द, गोखले जैसे व्यक्तियों से अपने जीवन में प्रभावित थे। उनका कहना था कि जीवन का अंतिम लक्ष्य आत्मानुभूति है। गाँधीजी के अनुसार आत्मानुभूति का अभिप्राय ईश्वर को आमने सामने देखना है, अर्थात् चरम सत्य महसूस करना है, जिसे अपने आप को भी मानना कहा जा सकता है। उनका यह भी विश्वास था कि इसे तब तक प्राप्त नहीं किया जा सकता जब तक मनुष्य सम्पूर्ण मनुष्य जाति में स्वयं को न ला सके। इसमें अनिवार्यतः राजनीति भी सम्मिलित है।

Author
प्रीति चाहल,
एसोसिएट प्रोफेसर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय।
 

DOI: https://doi.org/10.32381/LP.2024.16.04.8

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