लोक प्रशासन - A UGC-CARE Listed Journal
Association with Indian Institute of Public Administration
Current Volume: 17 (2025 )
ISSN: 2249-2577
Periodicity: Quarterly
Month(s) of Publication: मार्च, जून, सितंबर और दिसंबर
Subject: Social Science
DOI: https://doi.org/10.32381/LP
भारतीय ज्ञान परंपराः शिल्प शास्त्र का सामाजिक पहलू
By : नीना बंसल
Page No: 40-57
Abstract
भारतीय संस्कृति में ‘ज्ञान’, ’कला’ और ‘कौशल’ पर व्यापक ध्यान दिया गया, जो शिक्षा के समग्र एवं विविध दृष्टिकोण का सूचक है। प्राचीन भारतीय साहित्य में ‘शिल्प’ भी कला का प्रतीक है, जबकि ‘शास्त्र’ विज्ञान का प्रतिनिधित्व करता है। ’शिल्प शास्त्र’ सामूहिक रूप से कला और शिल्प के वैज्ञानिक अध्ययन को संदर्भित करता है। भारतीय उपमहाद्वीप के कई मंदिरों और मूर्तियों में आज भी इस तरह की शैली स्पष्ट रूप से विद्यमान है। मंदिर की वास्तुकला सदियों में विकसित हुई है, तथा बदलते राजवंशों और क्षेत्रों के साथ-साथ शैली भी बदली। आम आदमी के लिए मंदिर को पूजा स्थल के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, परन्तु दार्शनिक स्तर पर यह और भी बहुत कुछ दर्शाता है। प्रस्तुत लेख के द्वारा भारतीय सभ्यता में पल्लवित और पुष्पित प्राचीन ज्ञान के क्षेत्रों की महत्ता को पुनः स्थापित करने का प्रयास है, जिससे हम अपनी सभ्यता और उसकी प्राचीन विरासत को समझने और समझाने के लिए ज्ञान की इस शक्तिशाली कुंजी का प्रयोग सहज होकर कर सकें। इस शोधपत्र का मूल उद्देश्य यह है कि किसी भी सभ्यता का प्राचीन ज्ञान जैसे शिल्प, वास्तु, कला, संस्कृति, लोक संगीत, नृत्य, आध्यात्मिकता व अन्य संबंधित क्षेत्र, उस सभ्यता को समझने के लिए ज्ञान की शक्तिशाली कुंजी हैं।
Author : नीना बंसल, सह आचार्या, राजनीति विज्ञान विभाग, कमला नेहरू काॅलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली।
DOI: https://doi.org/10.32381/LP.2024.16.02.4