लोक प्रशासन - A UGC-CARE Listed Journal

Association with Indian Institute of Public Administration

Current Volume: 17 (2025 )

ISSN: 2249-2577

Periodicity: Quarterly

Month(s) of Publication: मार्च, जून, सितंबर और दिसंबर

Subject: Social Science

DOI: https://doi.org/10.32381/LP

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स्वतंत्रतापूर्व भारत में किसान आंदोलन: एक विश्लेषण 

By : सीमा दास , कामना कुमारी

Page No: 84-93

Abstract
कृषि भारत की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था का आधार रही है। ब्रिटिश राज के औपनिवेशिक काल में बदली हुई भूमि व्यवस्था व भू-राजस्व की नवीन पद्धतियों के कारण किसानों का शोषण सर्वाधिक हुआ। जमींदारों,साहूकारों, महाजनों आदि के शोषणकारी चरित्र ने किसानों की स्थिति को बहुत कमजोर कर दिया था। बढ़े हुए लगान, कर्ज व बेरोजगारी के दुष्चक्र ने किसानों की स्थिति को दयनीय कर दिया था। किसानों को उनकी जमीनों से बेदखल किया गया, जिससे वो ऐसी स्थिति में पहुँच गए जो दास व्यवस्था जैसी थी। सरकार द्वारा मालगुजारी प्रत्यक्षतः वसूलने की भूमिका त्याग दी गई और इसके लिए नवीन रास्ते अपनाए गए जैसे लगान की बढ़ती दर, व्यापार के क्षेत्र में घुसपैठ, उपभोक्ता सामान पर बढ़े हुए कर तथा दिनों दिन बढ़ता कर्ज। जिससे जमींदारी प्रथा का विकास होता चला गया। भारत के आर्थिक-सामाजिक ढांचे के भीतर मौजूदा अंतर्विरोधों ने देश के विभिन्न हिस्सों में अशान्ति बढ़ा दी। अतः किसानों ने अपने शोषण के विरूद्ध व अधिकारों की प्राप्ति के लिए विद्रोह किए। समयानुसार किसान आंदोलन की प्रकृति में परिवर्तन आया। 
     प्रस्तुत शोध पत्र का केंद्रबिन्दु स्वतंत्रता सेे पूर्व हुए महत्वपूर्ण किसान आंदोलन हैं। जिनका हम विश्लेषणात्मक अध्ययन एवं उनके महत्व को जानने का प्रयास करेंगे। इस अध्ययन में आवश्यकतानुसार द्वितीयक सामग्री-शोध पत्र, पुस्तक, लेख, शोध प्रबंध आदि का प्रयोग किया गया है।

Authors :
डा. सीमा दास : सहायक प्रोफेसर, राजनीति शास्त्र विभाग, महिला विश्वविद्यालय, बी.एच.यू. उत्तर प्रदेश।
कामना कुमारी: शोधकर्ता, राजनीति शास्त्र विभाग, बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश।
 

DOI: https://doi.org/10.32381/LP.2023.15.04.7

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