लोक प्रशासन - A UGC-CARE Listed Journal
Association with Indian Institute of Public Administration
Current Volume: 17 (2025 )
ISSN: 2249-2577
Periodicity: Quarterly
Month(s) of Publication: मार्च, जून, सितंबर और दिसंबर
Subject: Social Science
DOI: https://doi.org/10.32381/LP
विकास पर पुनर्विचारः पश्चिमी बनाम भारतीय परम्परा
By : रेनू , सार्तिक बाघ
Page No: 26-37
सार
वैश्विक स्तर पर अधिकांश देश विकास को मापने के लिए जीडीपी-आधारित मॉडल का उपयोग करते हैं। लेकिन विकास का अर्थ केवल आर्थिक विकास है या कुछ और? यह समकालीन समय में वाद-विवाद का एक मुख्य प्रश्न बना हुआ है। समकालीन समय में विश्व को अनेक प्रकार की पर्यावरणीय समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, जिसके पीछे मुख्य कारण हमारे द्वारा अपनाए जाने वाले विकास के तरीके हैं। भारत भी विकास के पश्चिमी मॉडल की ओर तीव्रता से अग्रसर हो रहा है तथा भारतीय परंपराओं को पीछे छोड़ता जा रहा हैं। इसलिए आवश्यक है कि पुनः भारतीय परंपराओं के अंतर्गत विकास के अर्थ को समझे तथा उस पर अमल करें। विकास के मानक क्या हैं ? भारतीय और पश्चिमी परंपरा में विकास का क्या अर्थ है? तथा यह एक दूसरे से कैसे भिन्न? इन सभी सवालों पर इस लेख में विस्तार से चर्चा की जाएगी।
लेखक
रेनू, शोध छात्रा, राजनीति विज्ञान विभाग, बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय लखनऊ (उ.प्र.)।
सार्तिक बाघ, प्रोफेसर तथा राजनीतिक विज्ञान विभाग के अध्यक्ष, बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर यूनिवर्सिटी, लखनऊ।
DOI: https://doi.org/10.32381/LP.2025.17.01.3