लोक प्रशासन - A UGC-CARE Listed Journal
Association with Indian Institute of Public Administration
Current Volume: 17 (2025 )
ISSN: 2249-2577
Periodicity: Quarterly
Month(s) of Publication: मार्च, जून, सितंबर और दिसंबर
Subject: Social Science
DOI: https://doi.org/10.32381/LP
भारत में संघवाद के बदलते आयाम
By : विजय शकंर चैधरी
Page No: 1-14
Abstract
सारांशः प्रस्तुत आलेख ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में भारत में संघवाद के बदलते आयामों का विश्लेषण करता है। संघवाद की उत्पत्ति भारत सरकार अधिनियम,1935 से र्हुइ । संघवाद सरकार का वह रूप है जिसमें शक्ति का विभाजन आंशिक रूप से केंद्र सरकार और राज्य सरकारों अथवा क्षेत्रीय सरकारों के मध्य होता है। संघवाद संवैधानिक तौर पर शक्तिको साझा करता है क्योंकि इसमें स्वशासन तथा साझा शासन की व्यवस्था होती है।आजादी के उपरांत से लेकर अब तक भारतीय संघवाद का स्वरूप बदलता रहा है।भारतीय राजनीति में र्कइ ऐसे परिवर्तन हुए जिसने संघीय प्रणाली को कई स्तरों पर प्रभावित किया है। इसके कारण देश में संघवाद के अलग-अलग चरण देखने को मिलते हैं। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद ‘एकदलीय प्रभुत्व’ के दौरान ‘केंद्रीकृत संघवाद’ था।
राजनीतिक एकल सत्ता और समय की माँग ने एक ऐसे परिस्थिति निर्मित की कि जनता के सामने ध्रुवतारा के रूप में नरेन्द्र मोदी आए और वर्ष 2014 के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने पूर्ण बहुमत प्राप्त कर सौदेबाजी व्यवस्था का वस्तुतः अंत कर दिया। गठबंधन की राजनीति चलती रही लेकिन सौदेबाजी बिल्कुल नियंत्रण में रही। इस सरकार ने अनुच्छेद 356 का कम दुरुपयागे किया। 2014 से लेकर अब तक भारतीय जनता पार्टी ठासे रूप से सत्ता में है। इसके फलस्वरूप केंद्र राज्यों के मुकाबले और मजबूत हो गया। 2014 के बाद पुनः केंद्रीकरण की प्रवृतियाँ मजबूत होने लगी हैं। जीएसटी, नीति आयोग, एनआईए (NIA) एवं कोरोना महामारी के विरूद्ध संघर्ष के कारण केंद्र की महती भूमिका हो गई है।
Author :
विजय शकंर चैधरी : शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, महात्मा गाँधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी, बिहार।