लोक प्रशासन - A UGC-CARE Listed Journal
Association with Indian Institute of Public Administration
Current Volume: 17 (2025 )
ISSN: 2249-2577
Periodicity: Quarterly
Month(s) of Publication: मार्च, जून, सितंबर और दिसंबर
Subject: Social Science
DOI: https://doi.org/10.32381/LP
गाँधी जी एवं समावेशी विकास का सशक्त आधारः सर्वोदय
By : डा0 संतोष कुमार सिंह
Page No: 90-103
Abstract
समावेशी विकास एक बहुआयामी सिद्धान्त है, जो सर्वजन हिताय एवं सर्वजन सुखाय तथा सम्यक न्याय पर आधारित है। यह सिद्धान्त अवसर की समानता सुनिश्चित करती है, जिससे व्यक्ति अपने कौशल विकास के माध्यम से राष्ट्र में अपनी सशक्त भागीदारी निभा सके। समावेशी विकास में जनसंख्या के सभी वर्गो के लिए बुनियादी सुविधाओं के प्रदान करने के साथ गरिमामयी जीवन जीने के साधनो का विकास तलाश करता है। समावेशी विकास का उद्देश्य एक ऐसे राज्य का निर्माण करता है जिसमें व्यक्ति का सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक विकास हो सके। समावेशी विकास की संकल्पना गरीबी उन्मूलन के पारम्परिक उद्देश्य से भी ऊपर उठकर समाज के वंचित और पिछडे़ वर्गों का सशक्तिकरण करना है। इस द्रिष्टि से भारत के पास गाँधी जी का अनुकरण करने और उनसे प्रेरणा ग्रहण करने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है। उन्होंने जो संदेश दिया, उसे बिना अतिरिक्त प्रयास के प्रयोग में लाया जा सकता है। उन्हें बहुत पहले ही इस बात का अहसास हो गया था कि भारत को भविष्य में अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। इसी वजह से उन्होंने इस देश को हमेशा के लिए महान और गौरवशाली राष्ट्र बनाए रखने के लिए समावेशी विकास का एक माॅडल ‘सर्वोदय‘ प्रस्तुत किया। समावेशी विकास के रूप में गाँधी जी द्वारा वर्णित सर्वोदय ही वह विचार है जो सबके कल्याण को परिभाषित करता है। अथार्थ वेश्विक परिद्र्श्य से इसका आशय लिया जाए तो इस द्रिष्टिकोड से सभी का उदय हो और जिससे सभी का सर्वागीढ विकास हो सके। सर्वोदय सिद्धान्त में प्रत्येक व्यक्ति का ध्यान रखा जाता है और यह “वसुधैव कुटुम्बकम्” की अवधारणा को सशक्त बनाती है। सही अर्थो में सर्वोदय ही वह सिद्धान्त है जो समावेशी विकास के समस्त आयामों को स्पर्श करता है ।
Author :
डा0 संतोष कुमार सिंह : सहायक आचार्य, अध्यक्ष, राजनीति विज्ञान विभाग, रानी धर्म कुँवर राजकीय महाविद्यालय, दल्लावाला, खानपुर, हरिद्वार, उत्तराखंड।