लोक प्रशासन - A UGC-CARE Listed Journal

Association with Indian Institute of Public Administration

Current Volume: 17 (2025 )

ISSN: 2249-2577

Periodicity: Quarterly

Month(s) of Publication: मार्च, जून, सितंबर और दिसंबर

Subject: Social Science

DOI: https://doi.org/10.32381/LP

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पारंपरिक भारतीय मौसम पूर्वानुमान तकनीक की वैज्ञानिकता एवं प्रासंगिकता की समीक्षाः भारतीय ज्ञान परंपरा में एक अध्ययन

By : शशि भूषण

Page No: 109-125

सार
मौसम के विविध स्वरूपों का हमारे पर्यावरण पर बहुविध प्रभाव पड़ता है, जिससे हमारी अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होती है। आगामी मौसम के बारे में समय रहते ही जानकारी हो जाने पर भविष्य में पर्यावरण एवं अर्थव्यवस्था संबंधी योजनाएँ पहले से ही बनाई जा सकती हैं। इसलिए मौसम का पूर्वानुमान काफी लाभप्रद एवं महत्त्वपूर्ण होता है। भारतीय परंपराओं में मौसम के ऐसे पूर्वानुमान के अत्यंत ही विकसित तकनीकों की व्यापकता एवं प्रचुरता है, जिसका कारण यह है कि भारतीय सभ्यता सुदीर्घ काल से निरन्तर प्रवाहमान रही है। काल के इस लम्बे अंतराल में हुए अनुभवों एवं प्रकृति की प्रयोगशाला में नित्य किए गए प्रयोगों पर आधारित ज्ञान ने भारतवंशियों को अत्यंत ही दक्ष मौसम वैज्ञानिक बना दिया है। प्रस्तुत शोध-पत्र में मौसम के पूर्वानुमान से संबंधित पारंपरिक भारतीय तकनीकों एवं आधुनिक पाश्चात्य पद्धतियों के तुलनात्मक विश्लेषण के आधार पर इस तथ्य को स्थापित किया गया है कि आधुनिक पाश्चात्य पद्धतियों पर आधारित प्रायः ही अपूर्ण, भ्रामक, अशुद्ध, अवास्तविक तथा अविश्वसनीय परिणामों के मुकाबले पारंपरिक भारतीय तकनीकों पर आधारित परिणाम प्रायः ही पूर्ण, सत्य, शुद्ध, वास्तविक, अधिकृत तथा विश्वसनीय होते हैं। पशु-पक्षियों के व्यवहार, हवाओं की दिशा, आकाश के रंग तथा पेड़-पौधों के परिवर्तनों आदि के आधार पर पारंपरिक भारतीय मौसम वैज्ञानिक आगामी मौसम की सटीक भविष्यवाणी करते रहे हैं। ऐसी हजारों-हजार तकनीकें संपूर्ण भारतवर्ष के ग्रामीण अंचलों में बिखरे पड़े हैं, जिनमें से कुछ, यथा- गौरैया का धूल में लेटना, बया पक्षी के घोसलों के प्रवेश द्वार की दिशा, घाघ भड्डरी की कहावतें अथवा लोकोक्तियाँ, महावीरी पताका या ध्वजा (हवाओं की दिशा ज्ञात करने का प्राचीन धार्मिक भारतीय उपकरण) एवं महाकवि कालिदास कृत मेघदूत में दक्षिण-पश्चिम मानसून के गमन पथ के भौगोलिक विश्लेषण के माध्यम से पारंपरिक भारतीय मौसम पूर्वानुमान तकनीक की वैज्ञानिकता एवं प्रासंगिकता की समीक्षा की गयी है।

लेखक
डॉ. शशि भूषण, वैज्ञानिक, पर्यावरण शोध एवं ग्रामीण विकास संस्थान, पटना।
 

DOI: https://doi.org/10.32381/LP.2025.17.04.8

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