लोक प्रशासन - A UGC-CARE Listed Journal

Association with Indian Institute of Public Administration

Current Volume: 17 (2025 )

ISSN: 2249-2577

Periodicity: Quarterly

Month(s) of Publication: मार्च, जून, सितंबर और दिसंबर

Subject: Social Science

DOI: https://doi.org/10.32381/LP

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औपनिवेशिक काल में जनजातीय किसान आंदोलनः एक अध्ययन

By : सीमा दास , कामना कुमारी

Page No: 65-81

सार
भारतीय समाज में आदिवासी समूहों की महत्वपूर्ण और अविभाज्य भूमिका रही है। ब्रिटिश क्षेत्र में उनके विलय और शामिल होने से पहले उनकी अपनी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्थाएँ थी। अंग्रेजों ने आदिवासियों और राज्य के बीच की सीमा को समाप्त कर नए नियम लागू किए। नीति निर्माण के साथ-साथ विकास के बड़े पूजीवादी ढांँचे में भी आदिवासी किसान सबसे ज्यादा उपेक्षित हुए। इससे सरकार और आदिवासियों के बीच कई संघर्ष हुए। इन संघर्षों को आदिवासी आंदोलन या विद्रोह का नाम दिया गया। ब्रिटिश शासन के दौरान जनजातीय आंदोलन की विशेषता उनकी आवृत्ति, उग्रवाद और हिंसा थी। जनजातीय किसान आंदोलन भारतीय कृषि इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना है जिसने न केवल सामाजिक न्याय और आर्थिक अधिकारों के लिए संघर्ष किया बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। भारत में आदिवासी आदोलनों ने औपनिवेशिक युग से लेकर आज तक सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आदिवासी समुदायों द्वारा सामना किए जाने वाले भूमि अलगाव, सांस्कृतिक दमन और आर्थिक शोषण जैसी चुनौतियों के परिणामस्वरूप इन आदोलनों का उदय हुआ। जनजातीय किसानों ने औपनिवेशिक शोषण, जमीदारी प्रथा, और वन संसाधनों पर अधिकारों के उल्लघन के खिलाफ इस विद्रोह की अगुवाई की। आर्थिक रूप से- इन आंदोलनों ने जनजातीय किसानों को संगठित किया और स्थानीय स्तर पर भूमि सुधार की मांँग को बढ़ावा दिया।

लेखक
सीमा दास, सहायक प्राध्यापक, राजनीतिक वि़ज्ञान, महिला महाविद्यालय, बी.एच.यू.।
कामना कुमारी, शोध छा़त्रा, राजनीति विज्ञान, महिला महाविद्यालय, बी.एच.यू.।
 

DOI: https://doi.org/10.32381/LP.2025.17.01.6

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