लोक प्रशासन - A UGC-CARE Listed Journal

Association with Indian Institute of Public Administration

Current Volume: 17 (2025 )

ISSN: 2249-2577

Periodicity: Quarterly

Month(s) of Publication: मार्च, जून, सितंबर और दिसंबर

Subject: Social Science

DOI: https://doi.org/10.32381/LP

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भारत में जल अभिशासनः सैद्धांतिक और क़ानूनी पृष्ठभूमि

By : विकास कुमार

Page No: 62-74

Abstract
इक्कीसवीं सदी के प्रारंभ तक यह स्पष्ट हो गया कि दुनिया जल संकट की अवस्था से गुजर रहा है जिसका असर आम-आदमी सहित सरकारों के काम-काज पर भी समान रूप से दिखाई देने लगा है। लेकिन इस समस्या की प्रमाणिकता को लेकर आम चर्चा और बहस 1970 के दशक के बाद से प्रारंभ हुई। इस बहस ने इस बात को स्थापित किया कि दुनिया की एक बड़ी आबादी के पास स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन जीने के लिए पर्याप्त मात्रा में पीने योग्य जल उपलब्ध नहीं है जो एक तरह से आम जनमानस और सरकारों के लिये संकट का उद्घोष है। देश-दुनिया में इसके कारणों को लेकर छिड़ी बहस से मुख्यतौर पर दो तरह के विश्लेषण उभर कर सामने आए। पहला, ‘माल्थुसियन प्रभाव’, जो संसाधनों की कमी, जनसंख्या का दबाव और सीमित विकास के संदर्भ में था। लेकिन दो दशक बाद ही जल संकट को लेकर दूसरा विश्लेषण मुख्य धारा में स्थापित हो गया जिसका मानना था कि विश्व में जल संकट की समस्या से जूझ रहे अधिकांश क्षेत्र राजनीति, गरीबी और पानी के प्रबंधन और उसके असमान आवंटन का परिणाम हैं। संक्षेप में, यह माना गया की मूल रूप से जल संकट दोषपूर्ण ‘अभिशासन’ का परिणाम है। इसकी पुष्टि सन् 2000 में प्रकाशित 'वल्र्ड वाटर काउंसिल’ की रिपोर्ट विस्तृत रूप से करती है जिसमें मुख्य रूप से इस बात पर ज़ोर दिया गया कि ‘जल संकट’ उसके प्रबंधन पद्धति का परिणाम हैं और इससे वर्तमान समय में दुनिया के अरबों लोग और पर्यावरण बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं। प्रस्तुत पत्र भारत में जल अभिशासन से सबंधित बनाए गए कानूनों और उसके सैद्धांतिक विमर्श पर प्रकाश डालता है। इसके अतिरिक्त सरकार द्वारा बनाए गए कानूनों  के स्वरूप और उसके प्रभावों का विश्लेषण भी प्रस्तुत करता है। 

Author :
विकास कुमार :
राजनीति विज्ञान विभाग, दीनदयाल उपाध्याय महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय।

DOI: https://doi.org/10.32381/LP.2024.16.01.5

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