लोक प्रशासन - A UGC-CARE Listed Journal

Association with Indian Institute of Public Administration

Current Volume: 15 (2023 )

ISSN: 2249-2577

Periodicity: Quarterly

Month(s) of Publication: मार्च, जून, सितंबर और दिसंबर

Subject: Social Science

DOI: https://doi.org/10.32381/LP

300

लोक प्रशासन भारतीय लोक प्रशासन संस्थान की एक सहकर्मी समीक्षा वाली त्रैमासिक शोध पत्रिका है ! यह UGC CARE LIST (Group -1 ) में दर्ज है ! इसके अंतर्गत लोक प्रशासन, सामाजिक विज्ञान, सार्वजनिक निति, शासन, नेतृत्व, पर्यावरण आदि से संबंधित लेख प्रकाशित किये जाते है !

अध्यक्ष
श्री एस. एन. त्रिपाठी

महानिदेशक, आई. आई. पी. ए. 
नई दिल्ली


सम्पादक
डा0 साकेत बिहारी 

आई. आई. पी. ए, नई दिल्ली


सह-सम्पादक
डा0 कृष्ण मुरारी 

दिल्ली विश्वविद्यालय,
नई दिल्ली


सम्पादक मंडल
श्री के. के. सेठी

अध्यक्ष, मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ
 क्षेत्रीय शाखा (आई. आई. पी. ए,)


प्रो. श्रीप्रकाश सिंह

दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिल्ली


डा0 शशि भूषण कुमार

सह-आचार्य, मुजफ्फरपुर
बिहार


डा0 अभय प्रसाद सिंह

दिल्ली विश्वविद्यालय
नई दिल्ली 


डा0 रितेश भारद्वाज

दिल्ली विश्वविद्यालय,
नई दिल्ली


श्री अमिताभ रंजन

कुलपति,आइ.आइ.पी.ए. नई दिल्ली


पाठ संशोधक
स्नहे लता

Volume 15 Issue 4 , (Oct- to Dec-2023)

सम्पादकीय

By 1: ..

Page No : v

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एक नेतृत्वकर्ता के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी, राजनेता, सांसद एवं प्रधानमंत्री

By 1: धारासिंह कुशवाहा , श्रीप्रकाश सिंह

Page No : 1-14

Abstract
स्वाधीनता पश्चात काल में, भारतीय लोकतंत्र की दशा एवं दिशा के निर्धारण में राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। एक राजनीतिक नेतृत्वकर्ता के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी ने भी राजनेता, सांसद, विदेश मंत्री तथा प्रधानमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए भारत की लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के कार्यचालन के सन्दर्भ में अपना विशेष योगदान दिया है। वास्तव में, एक राजनीतिक नेतृत्वकर्ता के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी का योगदान बहुआयामी रहा है।
   स्वाधीन भारत के राजनीतिक मानचित्र पर, अटल बिहारी वाजपेयी ने एक राजनेता की भूमिका में करीब पाँच दशक से अधिक का समय बिताया। अक्सर उन्हें आपसी सहयोग एवं सामंजस्य पर आधारित राजनीतिक नेतृत्व शैली संबंधी विशेषताओं के लिए याद किया जाता रहा है। अपनी विलक्षण वाक्पटुता एंव तर्कसंगत टीका-टिप्पणी की योग्यता के चलते, अटल बिहारी वाजपेयी ने भारतीय संसदीय संस्थाओं के सुसंगत संचालन में वृहद, विशेष एवं उल्लेखनीय योगदान दिया है। व्यावहारिक राजनीति में भी, पहले भारतीय जनसंघ तथा बाद में भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व करते हुए उन्होंने अपनी पार्टी की राजनीतिक स्थिति को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अपनी राजनीतिक यात्रा के चरम पर, अटल बिहारी वाजपेयी ने भारतीय लोकतंत्र के ‘शीर्ष राजनीतिक नेतृत्वकर्ता’ की भूमिका भी निभाई और तीन बार प्रधानमंत्री पद का कार्यभार संभाला।

Authors :
श्रीप्रकाश सिंह:  आचार्य, राजनीतिक विज्ञान विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय।
धारासिंह कुशवाहा: शोधार्थी, राजनीतिक विज्ञान विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय।
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2023.15.04.1

Price: 251

भारत मे नौकरशाही अनिर्णय और सुधारः नौकरशाही प्रदर्शन और मिशन कर्मयोगी की आवश्यकता का विश्लेषण

By 1: संगीता , प्रवीण कुमार झा

Page No : 15-25

Abstract
नौकरशाही संस्था प्राचीन काल से अस्तित्व में है और संस्था को हमेशा ऐसे कर्तव्य सौंपे गए हैं जिनके लिए बुद्धि, साहस की आवश्यकता होती है और साथ ही यह अधिकारियों को बहुत उच्च स्तर की शक्ति प्रदान करती है। भारतीय नौकरशाही को भी ऐसी शक्ति, जिम्मेदारी और निर्णय लेने की शक्ति सौंपी गई है। लेकिन इस संस्था की अक्सर भ्रष्टाचार, राजनीतिकरण, लालफीताशाही और नौकरशाही के आरोपों के साथ आलोचना की जाती रही है। हालाँकि यह संस्था राष्ट्र की क्षमता निर्माण के लिए डिजाइन की गई थी, लेकिन यह नेताओं और जनता की अपेक्षाओं को पूरा करने में काफी हद तक विफल रही और जल्द ही यह संस्था समय की माँगों को पूरा करने में कम कुशल और कम प्रभावी हो गई। इस लेख का उद्देश्य भारतीय नौकरशाही में निहित समस्याओं और मिशन कर्मयोगी द्वारा सुझाए गए सुधारों का अध्ययन करना है।
 
Authors :
प्रवीण कुमार झा: प्रोफेसर, शहीद भगत सिंह काॅलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय।
संगीता : प्रोफेसर, शहीद भगत सिंह काॅलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय।
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2023.15.04.2

Price: 251

 वैश्वीकरण 4.0 की दिशा में एक समावेशी दृष्टिकोण पर काम करनाः लैंगिक चिंताओं के महत्व पर एक केस स्टडी 

By 1: अक्षिता नागपाल , आमना मिर्जा

Page No : 26-35

Abstract
इस शोध पत्र का उद्देश्य लैंगिक असमानताओं और वैश्वीकरण की प्रक्रियाओं को रेखांकित करने वाली आर्थिक उदारीकरण सम्बन्धी नीतियों का अवलोकन करना है। यह अध्ययन इस बात पर प्रकाश डालता है कि वैश्वीकरण ने दुनिया में लैंगिक संबंधों को कैसे प्रभावित किया है। अध्ययन में वैश्वीकरण के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभावों को शामिल किया गया है। व्यापक आर्थिक नीतियों के परिणामों तथा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार नीतियों एवं प्रदर्शन के क्षेत्र में लैंगिक समानता को बढ़ावा देने हेतु सरकारों, नागरिक सामाजिक संगठनों और अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों सहित विभिन्न अभिनेताओं द्वारा की गई पहल को शामिल किया गया है। यह शोध पत्र इस वैश्वीकृत 
दुनिया में आर्थिक गतिविधियों में महिलाओं की भागीदारी कैसे बढ़ाई जाए, इस पर सिफारिशों का एक अध्ययन सामने रखता है। शोधपत्र कई खंडों में विभाजित है जो वैश्वीकरण के सभी पहलुओं, वर्षों में इसके परिवर्तन और महिलाओं के जीवन में हुए प्रभावों के बारे में चर्चा करता है।

Authors :
आमना मिर्जा : असिस्टेंट प्रोफेसर, एसपीएम कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय
अक्षिता नागपाल : डॉक्टरेट रिसर्च स्कॉलर, जामिया हमदर्द, नई दिल्ली
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2023.15.04.3

Price: 251

भारतीय लोकतंत्र की विशिष्टताएंः एक शोध अन्वेषण

By 1: कृष्ण मुरारी , अभय प्रसाद सिंह

Page No : 36-53

Abstract
भारतीय लोकतंत्र की विरासत औपनिवेशिक अनुभव, स्वतंत्रता आन्दोलन में विकसित साझी दूर दृष्टि एवं जन नायकों के सृजनात्मक कल्पनाशीलता का एक विशिष्ट संविधानिक अभिव्यक्ति है। नागरिक, राजनीतिक दल, शासकीय निकाय, न्यायपालिका,एवं नागरिक समाज के घटकों ने विगत साढ़ेसात दशकों में एक विमर्शी एवं समावेशी लोकतंत्र स्थापित किया है। दुनिया के प्राचीनतम एवं समकालीन लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में भारतीय लोकतंत्र अपने विशिष्टताओं के कारण संविधानवाद की एक अलग श्रेणी का प्रतिनिधित्व करता है। इस शोध आलेख में भारतीय लोकतंत्र के विशिष्टता विमर्श के प्रमुख आयामों जैसे, सामाजिक एवं जेंडर न्याय, शासकीय 
नियामक अभिकरण, राजनीतिक संस्कृति, सार्वभौमिक मताधिकार, मतदान व्यव्हार, आदि, का विद्वत विश्लेषण किया गया है। 

Authors :
अभय प्रसाद सिंह : प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग, पी.जी.डी.ए.वी. महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय
कृष्ण मुरारी : असिस्टेंट प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग, शहीद भगत सिंह महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय।
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2023.15.04.4

Price: 251

भारत में कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व, बदलता स्वरूप एवं प्रभाव

By 1: सोनम

Page No : 54-65

Abstract
सीएसआर (कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व) बड़े और छोटे दोनों उद्यमों को समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की जवाबदेही देता है। यह तब होता है जब कोई कंपनी न केवल अपने लाभ में वृद्धि के लिए बल्कि बड़े पैमाने पर समाज की भलाई के लिए सकारात्मक और प्रभावी ढंग से योगदान देकर उपभोक्ता विश्वास स्थापित करने के लिए भी काम करना चुनती है। आजकल कई निजी औद्योगिक एवं व्यावसायिक निगम महत्वपूर्ण सामाजिक उत्तरदायित्व परियोजनाएं चला रहे हैं, जो पूरी तरह से भारत में सीएसआर परियोजनाओं के तहत सामाजिक और पर्यावरणीय गतिविधियों को पूरा करने के लिए समर्पित हैं। 2013 अधिनियम के तहत इन जवाबदेहियों के 
क्रियान्वयन से संबंधित अधिकारियों को कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व के मुख्य अधिकारी या मुख्य स्थिरता अधिकारी (सीएसओ) कहा जाता है। (जेएसडीएम, 2022) इस शोध आलेख में 2013 के नई कंपनी अधिनियम के लागू होने के बाद सीएसआर में आए परिवर्तनों का विश्लेषण करने का प्रयास किया गया है। इसके अतिरिक्त, दस शीर्ष कंपनियों के सीएसआर के तहत विभिन्न क्षेत्रों में निवेश की प्राथमिकता का भी विश्लेषणात्मक अध्ययन किया गया है।

Author:
डा. सोनम :
वाणिज्य विभाग, शहीद भगत सिंह सांध्य महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय।
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2023.15.04.5

Price: 251

 समावेशी शिक्षा और राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020ः अवसर और चुनौतियाँ 

By 1: पंकज लखेरा

Page No : 66-83

Abstract
 शिक्षा व्यक्ति की छिपी हुई प्रतिभा को सामने लाने की प्रक्रिया है। वस्तुतः शिक्षा की यही अवधारणा प्राचीन काल से लेकर वर्तमान काल तक सभी शिक्षा प्रणालियों में सदैव रही है। स्वतंत्रता के बाद, भारत ने कोठारी आयोग की सिफारिश के आधार पर 1966 की शिक्षा नीति, 1986 की शिक्षा नीति, 2008 के शिक्षा का अधिकार अधिनियम के रूप में सभी के लिए शिक्षा कार्यक्रम आदि के रूप में विभिन्न प्रकार की शिक्षा नीतियों को अपनाया। उपरोक्त सभी नीतियों में शिक्षा को अधिक से अधिक छात्र-हितैषी, रोजगारोन्मुखी, समावेशी, सुलभ और स्थानीय परिवेश के लिए उपयुक्त बनाने के सभी प्रयास किए गए। लेकिन फिर भी, इतने ईमानदार कदमों के बावजूद, शिक्षा की पूरी प्रणाली की अक्सर उबाऊ, बोझिल, गैर-समावेशी, गैर-सुलभ और गैर-रोजगार उन्मुख होने के लिए आलोचना की जाती है। इन सभी चुनौतियों का सामना करने के लिए और शिक्षा को उत्कृष्ट स्तर का बनाने के लिए,वर्तमान सरकार सभी क्षेत्रों के राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञों के परामर्श के बाद और लाखों व्यक्तियों की प्रतिक्रिया को ध्यान में रखते हुए 2020 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति लेकर आई। हितधारकों वर्तमान पेपर विकलांग व्यक्तियों के लिए समावेशी शिक्षा के विशेष संदर्भ में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 का विश्लेषण करना चाहता है। यह नीति समाज के इस विशेष वर्ग की कितनी मदद करने वाली है? इस नीति के सकारात्मक पहलू क्या हैं? जहाँ तक विकलांग व्यक्तियों की जरूरतों का सवाल है, इस नीति में कुछ कमियाँ और चुनौतियाँ हैं?

Author:
पंकज लखेरा : एसोसिएट प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग, स्वामी श्रद्धानंद कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय।
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2023.15.04.6

Price: 251

स्वतंत्रतापूर्व भारत में किसान आंदोलन: एक विश्लेषण 

By 1: कामना कुमारी , सीमा दास

Page No : 84-93

Abstract
कृषि भारत की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था का आधार रही है। ब्रिटिश राज के औपनिवेशिक काल में बदली हुई भूमि व्यवस्था व भू-राजस्व की नवीन पद्धतियों के कारण किसानों का शोषण सर्वाधिक हुआ। जमींदारों,साहूकारों, महाजनों आदि के शोषणकारी चरित्र ने किसानों की स्थिति को बहुत कमजोर कर दिया था। बढ़े हुए लगान, कर्ज व बेरोजगारी के दुष्चक्र ने किसानों की स्थिति को दयनीय कर दिया था। किसानों को उनकी जमीनों से बेदखल किया गया, जिससे वो ऐसी स्थिति में पहुँच गए जो दास व्यवस्था जैसी थी। सरकार द्वारा मालगुजारी प्रत्यक्षतः वसूलने की भूमिका त्याग दी गई और इसके लिए नवीन रास्ते अपनाए गए जैसे लगान की बढ़ती दर, व्यापार के क्षेत्र में घुसपैठ, उपभोक्ता सामान पर बढ़े हुए कर तथा दिनों दिन बढ़ता कर्ज। जिससे जमींदारी प्रथा का विकास होता चला गया। भारत के आर्थिक-सामाजिक ढांचे के भीतर मौजूदा अंतर्विरोधों ने देश के विभिन्न हिस्सों में अशान्ति बढ़ा दी। अतः किसानों ने अपने शोषण के विरूद्ध व अधिकारों की प्राप्ति के लिए विद्रोह किए। समयानुसार किसान आंदोलन की प्रकृति में परिवर्तन आया। 
     प्रस्तुत शोध पत्र का केंद्रबिन्दु स्वतंत्रता सेे पूर्व हुए महत्वपूर्ण किसान आंदोलन हैं। जिनका हम विश्लेषणात्मक अध्ययन एवं उनके महत्व को जानने का प्रयास करेंगे। इस अध्ययन में आवश्यकतानुसार द्वितीयक सामग्री-शोध पत्र, पुस्तक, लेख, शोध प्रबंध आदि का प्रयोग किया गया है।

Authors :
डा. सीमा दास : सहायक प्रोफेसर, राजनीति शास्त्र विभाग, महिला विश्वविद्यालय, बी.एच.यू. उत्तर प्रदेश।
कामना कुमारी: शोधकर्ता, राजनीति शास्त्र विभाग, बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय, उत्तर प्रदेश।
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2023.15.04.7

Price: 251

ऐतिहासिक स्मारकों के संरक्षण से संबंधित नीतियाँः पश्चिम बंगाल के विशेष संदर्भ में अध्ययन 

By 1: पांचाली मजूमदार

Page No : 94-102

Abstract
स्मारक संरचनाएं या इमारतें हैं जो अपनी संस्कृति और स्थापत्य विरासत के लिए प्रसिद्ध हैं। वे भारतीय इतिहास के लंबे समय तक चलने वाली और लोकप्रिय प्रतीक हैं क्योंकि वे उनके बारे में राजनीतिक और ऐतिहासिक जानकारी दर्शाते हैं। ऐतिहासिक स्मारकों का सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व है, इसलिए उन्हें बहाल करने की आवश्यकता है, जिसके लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यूनेस्को, जबकि भारत के राष्ट्रीय और राज्य स्तर के पुरातत्व सर्वेक्षण और पश्चिम बंगाल हेरिटेज कमीशन जैसे राज्य स्तर के निदेशालय रखरखाव और संरक्षण में शामिल हैं। पश्चिम बंगाल के ऐतिहासिक स्मारक उसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के सबसे उत्कृष्ट प्रतिनिधि हैं। हालांकि, ऐसे कई स्मारकों की मरम्मत और पुनसर््थापन की आवश्यकता है। इस पत्र का उद्देश्य औपनिवेशिक युग से लेकर आज तक विरासत स्मारकों के संरक्षण के संबंध में ली गई नीतियों का विश्लेषण करना है, और मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल के मामले पर केंद्रित है।

Author :
पांचाली मजूमदार : सह आचार्या, रामकृ ष्ण श्रद्धा मिशन, विवेकानंद विद्याभवन, कोलकाता
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2023.15.04.8

Price: 251

बिहार के खनिज संसाधनों का भौगोलिक सर्वेक्षण: बिहार के विकास के संदर्भ में नीति-निर्माण हेतु रोडमैप

By 1: शशि भूषण

Page No : 103-123

Abstract
झारखंड निर्माण के बाद आम धारणा बन गयी कि बिहार खनिज संपदा की दृष्टि से निर्धन प्रदेश रह गया है। जबकि भौगोलिक-भूवैज्ञानिक यथार्थ यह है कि यद्यपि लौह-अयस्क, ताम्र-अयस्क एवं बॉक्साइट सदृश अनेक प्रकार की खनिज संपदा के व्यापक भंडार झारखंड के हिस्से में चले तो गए, तथापि धात्विक (हेमेटाइट व मैग्नेटाइट सदृश लौह धातुएँ, ताँबा व सीसा जैसी अलौह धातुएँ, बॉक्साइट प्रभृती हल्की अलौह धातु व सोने के रूप में बहुमूल्य अलौह धातु), अधात्विक (अभ्रक, एसबेस्टस, गंधक, चूना-पत्थर, बेराइट, क्षारीय नमक, सोडियम नमक, पोटाश, विविध प्रकार की मृत्तिकाएँ साधारण मृत्तिका, चीनी मिट्टी, अग्निसह मृत्तिका, मुल्तानी मिट्टी व सुघत्य मिट्टी, भवन निर्माण के पत्थर ग्रेनाइट, ग्रेनाइट-नीस, लैटेराइट, बालू-पत्थर, क्वाटर््जाइट व स्लेट, अलंकारी चट्टान, रोड मेटल, बहुमूल्य पत्थर व खनिज-जलस्रोत), आणविक (यूरेनियम, थोरियम, कोलम्बियम-टैन्टेलम, बेरिल व ग्रेफाइट) तथा अन्य प्रकार के खनिज संसाधनों (डोलोमाइट, फेल्सपार, सिलिका बालू, बालू-पत्थर, ट्रिपलाइट व काँच निर्माण के खनिज) का बिहार में उल्लेखनीय संचयन के साथ ही उनकी मौजूदगी की अतिरिक्त संभावनाएँ भी विद्यमान हैं। इस अध्ययन में बिहार के खनिज संसाधनों का गहन भौगोलिक सर्वेक्षण करते हुए नीति-निर्माण हेतु रोडमैप प्रस्तुत किया गया है। उपयुक्त सरकारी नीति-निर्माण व कुशल तकनीक का तार्किक अनुप्रयोग करके खनिज संसाधनों की उपलब्धता की पुष्टि करके उनका समुचित उत्खनन किया जाना समय की माँग है। इससे राज्य के औद्योगिक सह आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्त होगा।

Author :
शशि भूषण : वैज्ञानिक, पर्यावरण शोध एवं ग्रामीण विकास संस्थान, पटना।
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2023.15.04.9

Price: 251

दिल्ली की राजनीति में विभिन्न जातीय-धार्मिक समुदायों की भूमिकाः विधानसभा चुनावों के विशेष सन्दर्भ में 

By 1: सिद्धार्थ मुखर्जी , राकेश कुमार

Page No : 124-145

Abstract
दिल्ली राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र रही है। आजादी के बाद दिल्ली की जनसांख्यिकी में कई परिवर्तन आए हैं, अगस्त 1947 में लगभग पाँच लाख शरणार्थी दिल्ली आए थे (राज एवं सहगल, 1961)। दिल्ली की जनगणना के आंकड़ों में, 1941-51 के बीच, दिल्ली की जनसंख्या में 90 प्रतिशत की आश्चर्यजनक वृद्धि हुई, जबकि देश के बाकी हिस्सों में 13 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई थी (राज एवं सहगल, 1961)। इसके पश्चात् मुख्य रूप से बिहार और उत्तर प्रदेश से लोगों के तेजी से प्रवासन के परिणामस्वरूप दिल्ली के मतदाताओं की सामाजिक संरचना में बदलाव आया है। देश के अन्य राज्यों से भी लोग रोजगार के लिए दिल्ली आते हैं। हालाँकि यह प्रवासी मतदाता एक जातीय समूह से नहीं हैं और अपने मूल निवास स्थान, अपनी जाति और अपनी भाषा के संबंध में काफी विविधता रखते हैं। अलग-अलग राज्यों से आने वाले यह लोग दिल्ली में विभिन्न जातीय व धार्मिक समूहों का निर्माण करते हैं या अपने समूहों को संख्यात्मक मजबूती प्रदान करते हैं। मुख्य प्रश्न यह है कि क्या यह लोग अपने राज्य में जिस सामाजिक समूह से सम्बंधित होते हैं, दिल्ली में भी उसी समूह से प्रभावित होकर मतदान करते हैं? या दिल्ली में उनकें मतदान व्यवहार में कुछ अंतर होता है? क्या किसी समूह के मतदान व्यवहार में कोई स्थाई प्रतिरूप है? अथवा कोई समूह सामूहिक तौर पर किसी दल के प्रति आकर्षित रहा है? इस अध्ययन में दिल्ली के विभिन्न जातीय, धार्मिक समूहों के मतदान व्यवहार का अध्ययन किया गया है तथा उनके मतदान व्यवहार के प्रतिरूप का विश्लेषणात्मक अध्ययन किया गया है।

Authors :
राकेश कुमार : शोध छात्र, राजनीति विज्ञान विभाग, बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ।
सिद्धार्थ मुखर्जी : सह-आचार्य, राजनीति विज्ञान विभाग, बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ।
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2023.15.04.10

Price: 251

दफन होती जलनिधियाँः राजस्थान की जल-संस्कृति, समाज और विकासात्मक राज्य के संदर्भ में एक अध्ययन 

By 1: रेखा कुमारी

Page No : 146-156

Abstract
जल वह बहुमूल्य संपत्ति हैं जिस पर संपूर्ण मानव सभ्यता का भूत, भविष्य व वर्तमान निर्भर करता है। यही कारण है कि विश्व में जितनी भी सभ्यताओं व संस्कृतियों का विकास हुआ वह मुख्यतः जल स्त्रोतों के आस पास ही हुआ। पृथ्वी पर मानव जीवन की उत्पत्ति के समय से ही मानव व प्रकृति के बीच एक प्रकार का रहस्य रहा है। परंतु आधुनिकता व पुनर्जागरण के परिणामस्वरूप जिस प्रकार की तार्किकता व मानव बुद्धि का विकास हुआ उसने मानव व प्रकृति के बीच विद्यमान इस रहस्य को उद्घाटित करते हुए मानव मात्र को प्रकृति का दोहनकर्ता बना दिया है और आज स्थिति इतनी विकराल हो गई है कि मानव बुद्धि द्वारा निर्मित यही ज्ञान, आज उसी के अस्तित्व के लिए संकट उत्पन्न करने लगा है।1 इसी पृष्ठभूमि के संदर्भ में हमारा यह लेख विशेष रूप से राजस्थान में जल संकट की स्थिति का मूल्यांकन करते हुए, विकासात्मक राज्य व नागरिक समाज के बीच के अंतरसंबंधों का आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता इसके अतिरिक्त जल प्रबंधन व संरक्षण के संबंध में सदियों से लगे समाज की भूमिका का मूल्यांकन करते हुए, नागरिक समाज के संबंध में विद्यमान एकल समझ व विचार को पुनः परिभाषित कर नागरिक समाज की एक संदर्भ आधारित समझ प्रस्तुत करने की दिशा में एक प्रयास है।
 

Author :
रेखा कुमारी : पीएचडी शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय।
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2023.15.04.11

Price: 251

पुस्तक समीक्षाः हिमांशु रॉय, भारतीय ज्ञान मीमांसा पुनर्स्थापना का उपक्रम, मनोहर पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स,वर्ष 2023, पृष्ठ: 324 एवं मूल्यः 1,361

By 1: ..

Page No : 157-165

Price: 251

पुस्तक समीक्षाः सुनील आंबेकर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ: स्वर्णिम भारत के दिशा-सूत्र, प्रभात पेपरबैक्स, वर्ष 2023, पृष्ठः 272 एवं मूल्यः 300

By 1: ..

Page No : 166-171

Price: 251

Instruction to the Author

आलेख में सामग्री को इस क्रम में व्यवस्थित करेंः आलेख के शीर्षक, लेखकों के नाम, पते और ई-मेल, लेखकों का परिचय, सार संक्षेप, (abstract) संकेत शब्द, परिचर्चा, निष्कर्ष/सारांश, आभार (यदि आवश्यक हो तो) और संदर्भ सूची । 

सारसंक्षेपः सारसंक्षेप (abstract) में लगभग 100-150 शब्द होने चाहिए, तथा इसमें आलेख के मुख्य तर्को का संक्षिप्त ब्यौरा हो। साथ ही 4-6 मुख्य शब्द (Keywords) भी चिन्हित करें । 

आलेख का पाठः आलेख 4000-6000 शब्दों से अधिक न हो, जिसमें सारणी, ग्राफ भी सम्मिलित हैं। 

टाइपः कृपया अपना आलेख टाइप करके वर्ड और पीडीएफ दोनों ही फॉर्मेट में भेजे । टाइप के लिए हिंदी यूनिकोड का इस्तेमाल करें, अगर आपने हिंदी के किसी विशेष फ़ॉन्ट का इस्तेमाल किया हो तो फ़ॉन्ट भी साथ भेजे, इससे गलतियों की सम्भावना कम होगी, हस्तलिखित आलेख स्वीकार नहीं किए जाएंगे। 

अंकः सभी अंक रोमन टाइपफेस में लिखे। 1-9 तक के अंको को शब्दों में लिखें, बशर्ते कि वे किसी खास परिमाण को न सूचित करते हो जैसे 2 प्रतिशत या 2 किलोमीटर। 

टेबुल और ग्राफः टेबुल के लिए वर्ड में टेबुल बनाने की दी गई सुविधा का इस्तेमाल करें या उसे excel में बनाएं। हर ग्राफ की मूल एक्सेल कॉपी या जिस सॉफ़्टवेयर मैं उसे तैयार किया गया हो उसकी मूल प्रति अवश्य भेजे  सभी टेबुल और ग्राफ को एक स्पष्ट संख्या और शीर्षक दें। आलेख के मूल पाठ में टेबुल और ग्राफ की संख्या का समुचित जगह पर उल्लेख (जैसे देखें टेबुल 1 या ग्राफ 1) अवश्य करें। 

चित्राः सभी चित्र का रिजोलुशन कम से कम 300 डीपीआई/1500 पिक्सेल होना चाहिए। अगर उसे कही और से लिया गया हो तो जरूरी अनुमति लेने की जिम्मेदारी लेखक की होगी।

वर्तनीः किसी भी वर्तनी के लिए पहली और प्रमुख बात है एकरूपता। एक ही शब्द को अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग तरीके से नहीं लिखा जाना चाहिए। इसमें प्रचलन और तकनीकी सुविधा दोनों का ही ध्यान रखा जाना चाहिए।

• नासिक उच्चारण वाले शब्दों में आधा न् या म् की जगह बिंदी/अनुस्वार का प्रयोग करें। उदाहरणार्थ, संबंध के बजाय संबंध, सम्पूर्ण की जगह संपूर्ण लिखें। 

• अनुनासिक उच्चारण वाले शब्दों में चन्द्रबिन्दु का प्रयोग करें। मसलन, वहाँ, आये , जाएंगे, महिलाएं, आदि-आदि। कई बार सिर्फ बिंदी के इस्तेमाल से अर्थ बदल जाते हैं। इसलिए इसका विशेष ध्यान रखें, उदाहरण के लिए हंस और हँस। 

• जहाँ संयुक्ताक्षरों मौजूद हों और प्रचलन में हों वहाँ उन संयुक्ताक्षरों का भरसक प्रयोग करें। 

• महत्व और तत्व ही लिखें, महत्व या तत्व नहीं। 

• जिस अक्षर के लिए हिंदी वर्णमाला में अलग अक्षर मौजूद हो, उसी अक्षर का प्रयोग करें। उदाहरण के लिए, गए गयी की जगह गए, गई लिखें। 

• कई मामलों में दो शब्दों को पढ़ते समय मिलाकर पढ़ा जाता है उन्हें एक शब्द के रूप् में ही लिखें। उदाहरण के लिए, घरवाली, अखबारवाला, सब्जीवाली, गाँववाले, खासकर, इत्यादि। 

• पर कई बार दो शब्दों को मिलाकर पढ़ते के बावजूद उन्हें जोड़ने के लिए हाइफन का प्रयोग होता है। खासकर सा या सी और जैसा या जैसी के मामले में। उदाहरण के लिए,एक-सा, बहुत-सी, भारत-जैसा, गांधी-जैसी, इत्यादि। 

• अरबी या फारसी से लिए गए शब्दों में जहाँ मूल भाषा में नुक्ते का इस्तेमाल होता है। वहाँ नुक्ता जरूर लगाएं। ध्यान रहें कि क, ख, ग, ज, फ वाले शब्दों में नुक्ते का इस्तेमाल होताहै। मसलन, कलम, कानून, खत, ख्वाब, खैर, गलत, गैर इलरजत, इजाफा, फर्ज, सिर्फ। 

उद्धरणः पाठ के अंदर उद्धृत वाक्यांशों को दोहरे उद्धरण चिह्न (’ ’) के अंदर दें। अगर उद्धृत अंश दो-तीन वाक्यों से ज्यादा लंबा  हो तो उसे अलग पैरा में दें। ऐसा उद्धृत पैराग्राफ अलग नजर आए इसके लिए उसके पहले बाद में एक लाइन का स्पेस दें और पूरा पैरा को इंडेंट करें और उसके टाइप साईज को छोटा रखें। उद्धृत अंश में लेखन की शैली और वर्तनी में कोई तबदीली या सुधार न करें । 

पादटिप्पणी और हवाला (साईटेशन):  सभी पादटिप्प्णियाँ और हवालों (साईटेशन) के लिए मूल पाठ में 1,2,3,4,..... सिलसिलेवार संख्या दे और आलेख के अंत में क्रम में दे। वेबसाईट के मामले में उस तारीख का भी जिक्र करे जब अपने उसे देखा हो। मसलन, पाठ 1, मनोरंजन महंती, 2002, पृष्ठ और हर हवाला के लिए पूरा संदर्भ आलेख के अंत में दें।

सन्दर्भ: इस सूची में किसी भी संदर्भ का अनुवाद करके न लिखें, अथार्थ संदर्भो को उनकी मूल भाषा में रहने दें। यदि संदर्भ हिंदी व अंग्रेजी दोनों भाषाओं के हो तो पहले हिन्दी वाले संदर्भ लिखें तथा इन्हें हिन्दी वर्णमाला के अनुसार, और बाद में अंग्रेजी वाले संदर्भ को अंग्रेजी वर्णमाला के अनुसार सूचीबद्ध करें । 

•ए.पी.ए. स्टाइल फोलो करें। 

•मौलिकताः ध्यान रखें कि आलेख किसी अन्य जगह पहले प्रकाशित नहीं हुआ हो तथा न ही अन्य भाषा में प्रकाशित आलेख का अनुवाद हो। यानी आपका आलेख मौलिक रूप से लिखा गया हो। 

•कोशिश होगी कि इसमें शामिल ज्यादातर आलेख मूल रूप से हिंदी में लिखे गए हो । लेखकों से अपेक्षा होगी कि वे दूसरे किसी लेखक के विचारों और रचनाओं का सम्मान करते हुए ऐसे हर उद्धरण के लिए समुचित हवाला/संदर्भ देंगे ।अकादमिक जगत के भीतर बिना हवाला दिए नकल या दूसरों के लेखन और विचारों को अपना बताने (प्लेजियरिज्म) की बढ़ती प्रवृत्ति देखते हुए लेखकों का इस बारे मे विशेष ध्यान देना होगा । 

•समीक्षा और स्वीकृतिः प्रकाशन के लिए भेजी गयी रचनाओं पर अंतिम निर्णय लेने के पहले संपादक मडंल दो समीक्षकों की राय लेगा, अगर समीक्षक आलेख मे सुधार की माँग करें तो लेखक को उन पर गौर करना होगा।

•संपादन व सुधार का अंतिम अधिकार संपादकगण के पास सुरक्षित हैं। 

•कापीराइटः प्रकाशन का कापीराइट लेखक के पास ही रहेगा पर हर रूप में उसका प्रकाशन का अधिकार आई आई पी ए के पास होगा। वे अपने प्रकाशित आलेख का उपयोग अपनी लिखी किताब या खुद संपादित किताब मे आभार और पूरे संदर्भ के साथ कर सकते हैं। किसी दूसरे द्वारा संपादित किताब में शामिल करने की स्वीकृति देने के पहले उन्हें आई आई पी ए से अनुमति लेनी होगी।
 

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