लोक प्रशासन - A UGC-CARE Listed Journal

Association with Indian Institute of Public Administration

Current Volume: 15 (2023 )

ISSN: 2249-2577

Periodicity: Quarterly

Month(s) of Publication: मार्च, जून, सितंबर और दिसंबर

Subject: Social Science

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लोक प्रशासन भारतीय लोक प्रशासन संस्थान की एक सहकर्मी समीक्षा वाली त्रैमासिक शोध पत्रिका है ! यह UGC CARE LIST (Group -1 ) में दर्ज है ! इसके अंतर्गत लोक प्रशासन, सामाजिक विज्ञान, सार्वजनिक निति, शासन, नेतृत्व, पर्यावरण आदि से संबंधित लेख प्रकाशित किये जाते है !

अध्यक्ष
श्री एस. एन. त्रिपाठी

महानिदेशक, आई. आई. पी. ए. 
नई दिल्ली


सम्पादक
डा0 साकेत बिहारी 

आई. आई. पी. ए, नई दिल्ली


सह-सम्पादक
डा0 कृष्ण मुरारी 

दिल्ली विश्वविद्यालय,
नई दिल्ली


सम्पादक मंडल
श्री के. के. सेठी

अध्यक्ष, मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ
 क्षेत्रीय शाखा (आई. आई. पी. ए,)


प्रो. श्रीप्रकाश सिंह

दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिल्ली


डा0 शशि भूषण कुमार

सह-आचार्य, मुजफ्फरपुर
बिहार


डा0 अभय प्रसाद सिंह

दिल्ली विश्वविद्यालय
नई दिल्ली 


डा0 रितेश भारद्वाज

दिल्ली विश्वविद्यालय,
नई दिल्ली


श्री अमिताभ रंजन

कुलपति,आइ.आइ.पी.ए. नई दिल्ली


पाठ संशोधक
स्नहे लता

Volume 15 Issue 3 , (Jul- to Sep-2023)

सम्पादकीय

By: ..

Page No : v

नागरिक-केंद्रित प्रशासनः समस्याएं और संभावनाएं

By: देवेन्द्र प्रताप तिवारी

Page No : 1-16

Abstract
संविधान की प्रस्तावना सभी नागरिकों के लिए सामाजिक न्याय और आर्थिक अवसर सुनिश्चित करती है। इसके अलावा, राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत हमारे नागरिकों के समग्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस संबंध में, प्रशासनिक तंत्र संविधान की भावना के अनुसार कार्य करने के लिए उत्तरदायी है। हमारा संविधान प्रशासन को नागरिक केंद्रित दृष्टिकोण अपनाने की दिशा देता है। भारत में लोक नीतियों को तैयार करने के साथ-साथ इसके कार्यान्वयन में सिविल सेवक सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे देश के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रबंधकीय ढांचे की रीढ़ हैं। उनके कार्यक्षेत्र में न्यायपालिका से लेकर स्वास्थ्य सेवा, भूमि से लेकर समुद्र तक और जीवन के लगभग हर क्षेत्र से जुड़े मामलों का प्रबंधन शामिल है। राज्य एवं सरकार के अधिकांश लक्ष्य इन अधिकारियों के प्रदर्शन से जुड़े हैं, जो विभिन्न क्षमताओं, विभिन्न पृष्ठभूमि और पर्यावरण से आते हैं। प्रस्तुत शोध पत्र में भारत में नागरिक-प्रशासन की चुनौतियों एवं संभावनाओं का वर्णनात्मक एवं  विश्लेषणात्मक अध्ययन किया गया है।

Authors :
देवेन्द्र प्रताप तिवारी : सहायक प्राध्यापक, राजनीति विज्ञान, एस. एल. के. काॅलेज, सीतामढ़ी, (बी. आर. ए. बिहार, विश्वविद्यालय की एक अंगीभूत इकाई)।
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2023.15.03.1

Price: 101

भारतीय लोकतंत्र के सशक्त आयाम

By: संतोष कुमार सिंह

Page No : 17-40

Abstract
किसी भी राष्ट्र की प्रगति निश्चित रूप से उसके शासन व्यवस्था पर निर्भर करती है। इस दृष्टि से लोकतंत्र ही वह उत्तम शासन व्यवस्था है जिसमें सभी के मानवाधिकार सुरक्षित रह सकते हैं । लोकतंत्र उन महत्वपूर्ण और बहुमूल्य उपहारों में से एक है जिसे सभ्यता ने मानव जाति को दिया है और जिसका सम्मान पूरी दुनिया की बहुसंख्यक आबादी करती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था की लोकप्रियता एवं महत्व का सार सूत्र है- मनुष्य के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास। लोकतांत्रिक व्यवस्था की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, आविर्भाव एवं स्थायित्व का संवाहक तत्व संविधान का आदर-सम्मान, स्वतंत्रता, समानता, न्याय, अधिकार, पंथनिरपेक्षता, विधि का शासन, शासन के अंगों के मध्य सामंजस्य, सत्ता का विकेन्द्रीकरण आदि तत्व मिलकर एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की गतिविधियाँ हमेशा जनसरोकार की दिशा में क्रियाशील रहती हैं। इसमें सत्ता मशीनरी के माध्यम से निरंतर प्रयास किया जाता है कि एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था कायम की जा सके जिसमें एक कल्याणकारी राज्य स्थापित हो। भारत आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है क्योंकि भारत को आजाद हुए 75 वर्ष पूर्ण हो चुके है, जो निश्चित रूप से भारतीय लोकतंत्र को मजबूत कर रहा है। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। जनादेश से सत्ता में बदलाव बहुत व्यवस्थित और सहज ढंग से हुआ है। भारत में लोकतंत्र का विकास सदियों का परिणाम है। भारत ने एक ऐसे लोकतंत्र का अपनाया है जिसमें मर्यादा, संयम और अनुशासन की झलक दिखाई देती है। दूसरी ओर आधुनिक भारत को ऐसे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा रहा है, जिससे भारत की दशा और दिशा के सुनिश्चित प्रतिमान निर्धारित नहीं हो पा रहे हैं। इन चुनौतियों में शामिल हैंः सामाजिक-आर्थिक असमानता, गरीबी, बेरोजगारी,
अशिक्षा, जातिवाद, साम्प्रदायिकता, जनसंख्या वृद्धि, क्षेत्रवाद, भ्रष्टाचार, आंतकवाद, नक्सलवाद आदि। यदि समय रहते भारत की अनेक चुनौतियों का समाधान नहीं
किया गया तो भारतीय लोकतंत्र सुरक्षित नहीं रह सकता।

Auhors :
डाॅ संतोष कुमार सिंह :
असिस्टेंट प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग, रानी धर्म कुँवर राजकीय महाविद्यालय, दल्लावाला, खानपुर, हरिद्वार (उत्तराखण्ड) 
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2023.15.03.2

Price: 101

संवैधानिक लोकतंत्र, लोक नीति एवं नागरिक समाजः समकालीन विमर्श

By: अभय प्रसाद सिंह’ एवं कृष्ण मुरारी

Page No : 41-56

Abstract:
संवैधानिक भारतीय लोकतंत्र ने विधिक और सार्वजनिक संस्थाओं की कुछ रचात्नामक और कुछ नियंत्रण-उन्मुखी औपनिवेशिक विरासत के साथ उत्तर-औपनिवेशिक गणतंत्र का सफर शुरू किया। संहिताबद्ध कानून, नौकरशाही और संख्या की राजनीति लोकतांत्रिक व् नीति प्रक्रियाओं की औपनिवेशिक विरासत के कुछ प्रतिगामी पहलू हैं जिसके परिणामस्वरूप आज तक भ्रष्टाचार एवं जातिगत और अन्य पहचान की राजनीति प्रचलन में है। हालाँकि, सरकार, न्यायपालिका, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और रोजगार की आधुनिक संस्थाओं ने भारत में परिवर्तनकारी लोकतांत्रिक फल्क्रम के रूप में काम किया है। आंदोलनों से उत्पन्न राजनीतिक दलों ने लोकतांत्रिक नीति प्रक्रिया को सार्वजनिकता प्रदान की और धीरे-धीरे भारतीय लोकतंत्र को अधिक से अधिक प्रतिनिध्यात्मक और सहभागी बना दिया। सामाजिक और नए सामाजिक आंदोलनों, गैर-सरकारी संगठनों, मीडिया, बाजार और शिक्षित मध्यम वर्ग जैसे नागरिक समाज के घटक ने भी लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं को सृजनात्मक रूप से बदल दिया है और भारतीय लोकतंत्र को अधिक जवाबदेह और पारदर्शी बना दिया है। लोक कल्याण के निमित्त लोक सेवा प्रदायगी अभिकरणों एवं लोक नियामक संस्थाओं की महत्ती भूमिका ने भारतीय लोकतंत्र को वैश्विक लोकतान्त्रिक विश्व में एक विशिष्ट स्थान प्रदान किया है । बहरहाल, जातिवाद, नक्सलवाद, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और कृषि संकट जैसी चुनौतियाँ भारतीय लोकतंत्र में नीति विमर्श के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ प्रस्तुत कर रहे हैं।

Authors:
अभय प्रसाद सिंह: प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग, पी.जी.डी.ए.वी. महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय
कृष्ण मुरारी: असिस्टेंट प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग, शहीद भगत सिंह महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2023.15.03.3

Price: 101

संवैधानिक लोकतंत्र और समकालीन समाज की चुनौतियाँ

By: कन्हैया लाल

Page No : 57-79

Abstract
भारत विश्व का सबसे बड़ा संवैधानिक-लोकतांत्रिक देश है जहाँ विभिन्न जाति, धर्म, और संस्कृति के लोग साथ रहकर अनेकता में एकता का परिचय देते हैं। आजादी के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य मे भारत अमृत महोत्सव मना रहा है जो भारत के संविधान की सफलता, परिपक्वता और भारतीय समाज मंे उभरते नये आयाम को प्रदर्शित करता है जिसमें सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, और सबका प्रयास पर बल दिया जाता है। भारतीय संविधान निर्माताओं ने भारत को एक प्रभुसत्ता सम्पन्न लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया है जिसमें स्वतंत्रता, समानता, न्याय, बंधुता, लोकप्रभुसत्ता, शांतिपूर्ण संवैधानिक तरीकों व मूल्यों आदि पर विश्वास व्यक्त किया गया है। भारतीय संविधान को अपनाया जाना करोड़ों लोगों के जीवन का महत्वपूर्ण पल था। के.एम. पानिकर के अनुसार, ‘‘संविधान लोगों को दिया गया दृढ़ वचन है कि कानून समाज को नए सिद्धांतों पर पुर्नस्थापित करेगा व नूतन व्यवस्था में लाएगा।’’ भारत के संवैधानिक लोकतंत्र के अपने कुछ विशिष्ट विशेषताएँ हैं - लोकप्रभुसत्ता, मौलिक अधिकार, स्वतंत्र और निष्पक्ष न्यायपालिका, राजनीतिक भागीदारी, वयस्क मताधिकार, धर्मनिरपेक्षता, शक्तियों का विकेन्द्रीकरण, संविधान की सर्वोच्चता, कानून का शासन, उत्तरदायी, जवाबदेह और पारदर्शी सरकार आदि। 

भारतीय लोकतंत्र को विश्व का सबसे बड़ा लोकतन्त्र होने का सम्मान प्राप्त है, लेकिन इसके कुछ चुनौतियाँ भी हैं। वास्तव में भारतीय लोकतन्त्र केवल लोकतन्त्रीय सरकारें संगठित और संचालित करने में ही सफल हुआ है, इसे अपने सामाजिक-आर्थिक पहलूओं में अभी सफलता प्राप्त करनी है। इसमें जो प्रमुख चुनौतियाँ विद्यमान हैं वे हैंः सामाजिक और आर्थिक असमानताएँ, क्षेत्रवाद, जातिवाद, अलगाववाद और राजनीतिक हिंसा। ग़रीबी और बेकारी की चुनौतियों का सामना करने के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएं और लोगों को स्व-रोजगार अपनाने के लिए प्रेरित किया जाए। आधारभूत ढांचे के विकास के लिए बिजली यातायात और संचार सुविधाओं आदि की व्यवस्था व्यापक और व्यवस्थित रूप में की जानी चाहिए।

Author:
कन्हैया लाल: सहायक प्राध्यापक, राजनीति विज्ञान विभाग, एस.एस. मेमोरियल महाविद्यालय, राँची,राँची विश्वविद्यालय, राँची (झारखण्ड)।
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2023.15.03.4

Price: 101

भारत में लोक केन्द्रित प्रशासनः सिद्धान्त एवं व्यवहार

By: अखिलेश कुमार जायसवाल

Page No : 80-96

Abstract:
21वीं सदी में हम एक ऐसे राज्य में रह रहे हैं जिसे प्रशासकीय राज्य भी कहा जाता है, जो मानव जीवन के हर पहलू को किसी न किसी रूप में प्रभावित करता है। प्रशासकीय राज्य को लोककल्याणकारी बनाने हेतु शासन-प्रशासन के जन केन्द्रित होकर कार्य करने पर बल दिया जाता है और इसी कारण लोक केन्द्रित प्रशासन की अवधारणा ने जन्म लिया जिसमें जन कल्याण को प्रशासन के केन्द्र में रखा जाता है। भारत की प्रशासनिक व्यवस्था लोक केन्द्रित होने की दिशा में निरन्तर अग्रसर है और भारतीय प्रशासन को लोक केन्द्रित बनाने हेतु अनेक उपाय किए गए हैं, जैसे- संवैधानिक प्रावधान, कानून-निर्माण द्वारा लोक संस्थाओं का गठन- लोक शिकायत निदेशालय, नागरिक चार्टर्स, लोकपाल व लोकायुक्त, मुख्य सतर्कता आयुक्त, सूचना का अधिकार, विभिन्न आयोग एवं न्यायाधिकरण एवं सरकार द्वारा समय-समय पर जारी किए गए निर्देश व योजनाएँ। इन सबके बावजूद अभी भी भारत की प्रशासनिक तंत्र में अनेक व्यवस्थागत खामियां व्याप्त हैं, जैसे-भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, लालफीताशाही, आमजन के प्रति लोक सेवकों का उदासीन रवैया, प्रशासन में राजनैतिक हस्तक्षेप आदि। लेकिन तकनीकी क्रान्ति व आमजन की जागरूकता ने धीरे-धीरे प्रशासन को लोक केन्द्रित होकर कार्य करने के लिए प्रेरित किया है।

Author:
अखिलेश कुमार जायसवाल: असिस्टेन्ट प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग, हिन्दू पी0 जी0 काॅलेज, जमानियाँ, गाजीपुर, उ0 प्र0-233131,
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2023.15.03.5

Price: 101

लोक केन्द्रित प्रशासन के वर्तमान अस्थायी प्रयास और स्थायी तन्त्र की संभावनाएँ

By: जोरावर सिंह राणावत

Page No : 97-114

Abstract
लोक प्रशासन शब्द का अर्थ स्वयं में ही लोक केन्द्रित प्रशासन है तथा जिसका अर्थ जनता के लिए प्रशासन से लगाया जा सकता है। प्रशासन के प्रमुख लक्षणों में से एक विकेन्द्रीकरण है जो शासन का अन्तिम व्यक्ति तक पहुँचना सुनिश्चित करता है। प्रशासन को पारदर्शी, प्रभावशाली, कार्यकुशल, भ्रष्टाचार मुक्त एवं सुशासन बनाने के पीछे मुख्य उद्देश्य जनता की इस तक पहुँच कोे सुगम बनाना तथा सेवा प्रदायगी और शिकायत निवारण को त्वरित बनाना है। इसे ही सुशासन एवं कुशल प्रशासन कहा जाता है और इसे ही रामराज की संज्ञा भी दी जाती है। प्रत्येक सरकार स्वयं को ऐसा बनाने और जनता तक पहुँच सुनिश्चित करने के लिए ऐसे कई प्रयास करती हैं। वर्तमान में भी विभिन्न राज्यों की सरकारों द्वारा प्रशासन आपके द्वार, शासन आपके संग जैसे अस्थायी प्रयास के द्वारा जनता की शिकायतों का निवारण किया जाता है और जनता के लिए सेवा प्रदायगी सुनिश्चित की जाती है। प्रस्तुत लेख में विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा चलाये जा रहे ऐसे कार्यक्रमों का अनुभवमूलक मूल्यांकन प्रस्तुत करते हुए इनकी कमियों को उजागर करने का प्रयास किया है।

प्रस्तुत लेख में यादृच्छिक निदर्शन विधि द्वारा 100 व्यक्तियों का निदर्श के रूप में चुनाव किया गया है जिसमें समाज के सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व दिया गया है। इनसे प्राप्त अनुभवमूलक प्रतिक्रियाओं द्वारा लोक केन्द्रित प्रशासन के लिए सरकार द्वारा किये गये अस्थायी प्रयासों का विश्लेषण करते हुए स्थानीय स्तर पर एक स्थायी तन्त्र के विकास का माॅडल प्रस्तुत किया है जिसमें लोक केन्द्रित शिकायत निवारण एवं सेवा प्रदाता केन्द्र की स्थापना का प्रावधान किया है। यह केन्द्र स्थानीय स्तर की समस्त सेवाओं तथा शिकायतों के निवारण के लिए ’सिंगल विण्डो’ की तरह विकसित किया जा सकता है। लेख में इस केन्द्र की स्थापना में आने वाली बाधाओं का विश्लेषण करते हुए उनके निवारण के लिए समाधान भी प्रस्तुत किये गए हैं।

Author
जोरावर सिंह राणावत: सहायक आचार्य एवं सहायक अधिष्ठाता, राजनीति विज्ञान एवं लोक प्रशासन विभाग, कला एवं मानविकी संकाय, संगम विश्वविद्यालय, भीलवाड़ा (राज.)।
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2023.15.03.6

Price: 101

संवैधानिक प्रजातंत्रा में महिलाओं की चुनावी सहभागिता- भारत की चुनावी राजनीति में महिला मतदाताओं की बढ़ती भूमिका और मतदान व्यवहार का अध्ययन

By: राकेश कुमार

Page No : 115-127

Abstract:
डाॅ. बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर का महिलाओं के संदर्भ में मानना था की “मैं समुदाय की प्रगति को महिलाओं द्वारा हासिल की गई प्रगति के स्तर से मापता हूँ। शादी करने वाली हर लड़की अपने पति के साथ- साथ खड़ी हो, अपने बराबर होने का दावा करे और उनकी दासी बनने से इंकार करे मुझे यकीन है कि यदि आप इस सलाह का पालन करते हैं, तो आप सम्मान वह गौरव लाएगें” (सिंगारिया, 2014)। भारत की राजनीति में महिलाओं की हालिया भागीदारी से कुछ बिंदु स्पष्ट हैं पहला, लगातार पिछले कुछ वर्षों से महिला मतदान प्रतिशत में हो रही बढ़ोतरी 2019 के लोकसभा चुनाव में अब तक के शीर्ष स्तर पर पहुच गई है दूसरा, राजनैतिक दलों के चुनाव प्रचार से लेकर सरकारों की विभिन्न योजनाओं तक का निर्माण महिलाओं को केंद्र में रख कर किया जा रहा है। महिलाओं का मतदान प्रतिशत तो बढ़ा है लेकिन मुख्य प्रश्न यह है की क्या महिला मतदाता किसी तरह का राजनीतिक बदलाव करने में सक्षम है? इस अध्ययन में महिलाओं के मतदान व्यवहार पर भी चर्चा की गई है।
 
इस अध्ययन के लिए द्वितीय स्त्रोतों का प्रयोग किया गया है तथा विश्लेषणात्मक अध्ययन पद्धति को अपनाया गया है। तथा वर्तमान में उभरते मतदान प्रतिरूप पर चर्चा की गई है। संसद वह राज्य की विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व उनकी जनसख्याँ के अनुपात में बहुत कम रहा है इसके बावजूद भी संसद महिला आरक्षण बिल को स्वीकृति नही दे पाई है। राजनैतिक दलों ने अपने दल के भीतर महिला विंग का निर्माण तो किया है परन्तु चुनावों में महिलाओं को टिकट देने में अभी भी दल बहुत पीछे है। इसके बावजूद भारत की चुनावी राजनीति मे महिलाओं का मतदाता के रूप मे उभार देखने को मिला है जोकि चुनाव के परिणामों को भी प्रभावित करने मे सक्षम है। इस अध्ययन में महिलाओं की चुनावी भागीदारी को एतिहासिक दृष्टि से दर्शया गया है तथा उनकी बढती भूमिका के कारण भारतीय राजनीति में हो रहे परिवर्तनों पर चर्चा की गई है। 

Author
राकेश कुमार: शोधार्थी-राजनीति विज्ञान विभाग, बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय, (केन्द्रीय) लखनऊ।
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2023.15.03.7

Price: 101

ई-गवर्नेंस तथा जिला प्रशासन में नवाचार

By: धनंजय शर्मा

Page No : 128-141

Abstract
जब किसी भी राज्य के प्रशासन को आसानी व सुगमता से चलाने के लिए राज्यों को संभागों व संभागों को जिलों में विभक्त किया गया है। जिला प्रशासन राज्य प्रशासन की महत्वपूर्ण प्रशासनिक संरचना है, जो राज्य के सचिवालय तथा तहसीलों के मध्य समन्वयक कड़ी भी भूमिका निभाता है। जिला प्रशासन जिले में सरकार के समस्त कार्य करता है। इसी कारण किसी भी राज्य की ‘सुरक्षा‘ एवं ‘विकास‘ जिला प्रशासन की परिधि में आते हैं। ई-गवर्नेंस सुशासन का महत्वपूर्ण घटक है। भारत में ई-गवर्नेंस के माध्यम से सुशासन लाने की दिशा में केन्द्र सरकार द्वारा पिछले कुछ सालों में कई कदम उठाए जिससे डिजिटल इंडिया का सपना साकार हो सके। ई-गवर्नेंस का माॅडल अपनी जगह पर स्थापित करने के प्रयास जारी है। सरकार तथा नागरिकों के बीच मौजूद दूरियाॅ भी कम हुई हैं। इंटरनेट, मोबाइल फोन और गाॅव-गाॅव, शहर-शहर में फैले सरकारी सेवा प्रदाताओं (कियोंस्क) के माध्यम से लोग पहले की तुलना में ज्यादा आसानी से सरकारी सेवाओं का इस्तेमाल कर पा रहे हैं। जिससे प्रकियाएँ सरल हुई हैं तथा पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ी है। तथा ई-गवर्नेंस से संबधित सेवाओं के वितरण को बढ़ाने में क्लाउड कंप्यूटिंग की भी एक बड़ी भूमिका है।

Author:
धनंजय शर्मा: सहायक प्रध्यापक (समाजशास्त्र), रानी धर्म कुॅंवर राजकीय महाविद्यालय, दल्लावाला-खानपुर, हरिद्वार, (उत्तराखण्ड )
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2023.15.03.8

Price: 101

जिला स्तर का प्रशासन और उपयोगी नवाचार

By: पूजा गुप्ता एवं निलांजना जैन

Page No : 142-150

Abstract:
यह लेख भारतीय प्रशासनिक जिलों की ओर नवाचार के रुझान की गंभीर रूप से विश्लेषण करता है। यह 21वीं सदी के नवाचार जिले को प्रमुखता से समझने का एक प्रयास है। नवाचार जिलों का प्रशासन एक विशेष ज्ञान व रुझान पर आधारित होता है। जो आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक विकास की रणनीति तय करने में सहयोग करते हैं  तथा प्रक्रिया और उत्पाद के लिए आवश्यक माने जाने वाले अभिनेताओं और संस्थाओं के लिए बुनियादी ढांचों पर ध्यान केंद्रित करते हैं । नवाचार का प्रमुख लक्ष्य समाज के सर्वांगीण विकास के लिए निरंतर सहभागिता को प्रोत्साहित करना है। यह लेख मुख्यता भारतीय प्रशासनिक जिलों द्वारा बनाए जा रहे नवाचार के साधनों और योजनाओं का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत करना है, जिसके द्वारा भारत जैसे वृहद विविधता पूर्ण देश में प्रशासनिक सुधार और विकास को बढ़ावा मिले। प्रस्तुत शोध का निष्कर्ष वर्तमान में भारतीय प्रशासनिक जिलों के लिए प्रयोग में लाए जा रहे उपयोगी नवाचार के वृहद अध्ययन को प्रस्तुत करना है।

Author:
पूजा गुप्ता: आर्य कन्या डिग्री कालेज, संबद्ध इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज
निलांजना जैन: प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग, आर्य कन्या डिग्री कालेज, संबद्ध इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2023.15.03.9

Price: 101

ग्रामीण लोक केंद्रित व्यवस्था हेतु पुरा-परियोजना की संकल्पनाः आशा एवं निराशा

By: सुशांत यादव

Page No : 151-161

Abstract:
कोरोना महामारी जैसे वैश्विक संकट से आज पूरा विश्व भयभीत है और इसके दुष्परिणामों को विश्व के तमाम देशों के साथ भारत भी झेल रहा है। महामारी के इस माहौल में सबसे ज़्यादा प्रभावित होने वाली संख्या गरीब व्यक्तियों की हैं। जिनका अधिसंख्य मूल निवास भारत के गाँवों में हैं। इस परिप्रेक्ष्य में भारत के पूर्व राष्ट्रपति और प्रसिद्ध वैज्ञानिक ए.पी.जे अब्दुल कलाम का मानना था कि गाँवों में बसे व्यक्तियों को समाहित किए बग़ैर हम भारत की पूर्ण तस्वीर का निर्माण नहीं कर सकते हैं। अतः विकास से संबंधित किसी भी नीति का निर्माण इस तथ्य को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए कि, वह ग्रामीण भारत की आवश्यकता को किस हद तक पूर्ण कर सकता है। अगर वह नीति इन अधिसंख्य भारतीयों की आवश्यकता को स्वयं में समाहित नहीं करती तो नीति निर्माण संस्थानों को इस पर पुनर्विचार करना चाहिए। गांवों का सामाजिक-राजनीतिक जीवन दर्शन महात्मा गांधी के आत्मनिर्भर एवं स्वायत्त गांवों की संकल्पना से लेकर ए.पी.जे अब्दुल कलाम की पुरा (प्रोविज़न आफ अर्बन एमेनीटिज़ टू रूरल एरियाज.) परियोजना तक भारत के ग्रामीण समाज के सामाजिक राजनीतिक जीवन में अनेक परिवर्तन देखने को मिलते हैं। वैसे तो आत्मनिर्भरता की अवधारणा एवं पुरा परियोजना की संकल्पना दोनों ही विशुद्ध अर्थशास्त्रीय संकल्पनाएँ हैं, परन्तु समाज का अर्थशास्त्र, समाज एवं समाज की राजनीति दोनों को अपरिहार्य रूप से प्रभावित करती है। इसी अर्थशास्त्र के कारण गावों का समाज एवं इसकी राजनीति हमेशा से अद्वितीय एवं अनोखा चित्र प्रस्तुत करते आये हैं। उपर्युक्त आलेख में गाँव-शहर के इसी सम्बंधों पर कलाम के पुरा परियोजना की अवधारणा से समबंधित विचारों और पहलुओं का मूल्याँकन प्रस्तुत किए जाने का प्रयास किया गया है।|

Author
सुशांत यादव: कृषक स्नातकोत्तर महाविद्यालय, मवाना (मेरठ, उ.प्र.) 
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2023.15.03.10

Price: 101

लोक कल्याणकारी राज्य की संकल्पना में किशोर न्याय प्रशासन

By: सुमिता मुदगल

Page No : 162-172

Abstract
भारतीय शासन व्यवस्था में राज्य मनुष्य की उस समुदाय से संबंधित संकल्पना है जो एक निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए एक निश्चित भूभाग पर परस्पर संगठित होकर अपनी एक संप्रभु सरकार स्थापित करती है। मानव जीवन के कल्याण के क्षेत्र में राज्य की भूमिका को विभिन्न विचारधाराओं में से किसी ने राज्य को एक दमनकारी संस्था के रूप में परिभाषित किया तो किसी ने राज्य को एक आदर्श राज्य के रूप में प्रस्तुत किया। प्राचीन भारत की रामराज्य धारणा का विकसित रूप वर्तमान में लोक कल्याणकारी राज्य के रूप में दृष्टिगत होता है। नैतिक संगठन के रूप में मान्यता प्राप्त ऐसे राज्य का मुख्य उद्देश्य समाज के सभी वर्गों का चहुँमुखी विकास और कल्याण करना है। इसी उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए भारतीय संविधान के भाग 4 में नीति निर्देशक सिद्धांतों में चिन्हित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए तथा समाज कल्याण प्रशासन की महत्वता को स्वीकार करते हुए भारत सरकार ने सन् 1985 में कल्याण मंत्रालय स्थापित किया जिसे 1998 में परिवर्तित कर सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के रूप में पुर्नस्थापित किया गया। सरकार द्वारा कल्याण को सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न विधिक प्रयास भी किए गए जिसमें से एक प्रयास किशोर न्याय (बालकों की सुरक्षा एवं देखभाल) अधिनियम, 2015 के रूप में परिलक्षित होता है जो बालकांे की सुरक्षा एवं कल्याण के लिए स्थापित विभिन्न संस्थाओं के रूप में समाज में किशोर न्याय प्रशासन की वकालत करता है। उक्त अधिनियम में वर्णित विभिन्न सिद्धांत तथा कानूनी प्रावधान बालकों की देखरेख एवं सुरक्षा को लेकर राज्य की लोक कल्याणकारी भूमिका को उजागर करते हैं।

Author
सुमिता मुदगल: शोधार्थी, लोक प्रशासन विभाग, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय उदयपुर।
 

DOI : https://doi.org/10.32381/LP.2023.15.03.11

ग्रंथ सूची

By: सुमिता मुदगल

Page No : 173-175

Price: 101

Instruction to the Author

आलेख में सामग्री को इस क्रम में व्यवस्थित करेंः आलेख के शीर्षक, लेखकों के नाम, पते और ई-मेल, लेखकों का परिचय, सार संक्षेप, (abstract) संकेत शब्द, परिचर्चा, निष्कर्ष/सारांश, आभार (यदि आवश्यक हो तो) और संदर्भ सूची । 

सारसंक्षेपः सारसंक्षेप (abstract) में लगभग 100-150 शब्द होने चाहिए, तथा इसमें आलेख के मुख्य तर्को का संक्षिप्त ब्यौरा हो। साथ ही 4-6 मुख्य शब्द (Keywords) भी चिन्हित करें । 

आलेख का पाठः आलेख 4000-6000 शब्दों से अधिक न हो, जिसमें सारणी, ग्राफ भी सम्मिलित हैं। 

टाइपः कृपया अपना आलेख टाइप करके वर्ड और पीडीएफ दोनों ही फॉर्मेट में भेजे । टाइप के लिए हिंदी यूनिकोड का इस्तेमाल करें, अगर आपने हिंदी के किसी विशेष फ़ॉन्ट का इस्तेमाल किया हो तो फ़ॉन्ट भी साथ भेजे, इससे गलतियों की सम्भावना कम होगी, हस्तलिखित आलेख स्वीकार नहीं किए जाएंगे। 

अंकः सभी अंक रोमन टाइपफेस में लिखे। 1-9 तक के अंको को शब्दों में लिखें, बशर्ते कि वे किसी खास परिमाण को न सूचित करते हो जैसे 2 प्रतिशत या 2 किलोमीटर। 

टेबुल और ग्राफः टेबुल के लिए वर्ड में टेबुल बनाने की दी गई सुविधा का इस्तेमाल करें या उसे excel में बनाएं। हर ग्राफ की मूल एक्सेल कॉपी या जिस सॉफ़्टवेयर मैं उसे तैयार किया गया हो उसकी मूल प्रति अवश्य भेजे  सभी टेबुल और ग्राफ को एक स्पष्ट संख्या और शीर्षक दें। आलेख के मूल पाठ में टेबुल और ग्राफ की संख्या का समुचित जगह पर उल्लेख (जैसे देखें टेबुल 1 या ग्राफ 1) अवश्य करें। 

चित्राः सभी चित्र का रिजोलुशन कम से कम 300 डीपीआई/1500 पिक्सेल होना चाहिए। अगर उसे कही और से लिया गया हो तो जरूरी अनुमति लेने की जिम्मेदारी लेखक की होगी।

वर्तनीः किसी भी वर्तनी के लिए पहली और प्रमुख बात है एकरूपता। एक ही शब्द को अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग तरीके से नहीं लिखा जाना चाहिए। इसमें प्रचलन और तकनीकी सुविधा दोनों का ही ध्यान रखा जाना चाहिए।

• नासिक उच्चारण वाले शब्दों में आधा न् या म् की जगह बिंदी/अनुस्वार का प्रयोग करें। उदाहरणार्थ, संबंध के बजाय संबंध, सम्पूर्ण की जगह संपूर्ण लिखें। 

• अनुनासिक उच्चारण वाले शब्दों में चन्द्रबिन्दु का प्रयोग करें। मसलन, वहाँ, आये , जाएंगे, महिलाएं, आदि-आदि। कई बार सिर्फ बिंदी के इस्तेमाल से अर्थ बदल जाते हैं। इसलिए इसका विशेष ध्यान रखें, उदाहरण के लिए हंस और हँस। 

• जहाँ संयुक्ताक्षरों मौजूद हों और प्रचलन में हों वहाँ उन संयुक्ताक्षरों का भरसक प्रयोग करें। 

• महत्व और तत्व ही लिखें, महत्व या तत्व नहीं। 

• जिस अक्षर के लिए हिंदी वर्णमाला में अलग अक्षर मौजूद हो, उसी अक्षर का प्रयोग करें। उदाहरण के लिए, गए गयी की जगह गए, गई लिखें। 

• कई मामलों में दो शब्दों को पढ़ते समय मिलाकर पढ़ा जाता है उन्हें एक शब्द के रूप् में ही लिखें। उदाहरण के लिए, घरवाली, अखबारवाला, सब्जीवाली, गाँववाले, खासकर, इत्यादि। 

• पर कई बार दो शब्दों को मिलाकर पढ़ते के बावजूद उन्हें जोड़ने के लिए हाइफन का प्रयोग होता है। खासकर सा या सी और जैसा या जैसी के मामले में। उदाहरण के लिए,एक-सा, बहुत-सी, भारत-जैसा, गांधी-जैसी, इत्यादि। 

• अरबी या फारसी से लिए गए शब्दों में जहाँ मूल भाषा में नुक्ते का इस्तेमाल होता है। वहाँ नुक्ता जरूर लगाएं। ध्यान रहें कि क, ख, ग, ज, फ वाले शब्दों में नुक्ते का इस्तेमाल होताहै। मसलन, कलम, कानून, खत, ख्वाब, खैर, गलत, गैर इलरजत, इजाफा, फर्ज, सिर्फ। 

उद्धरणः पाठ के अंदर उद्धृत वाक्यांशों को दोहरे उद्धरण चिह्न (’ ’) के अंदर दें। अगर उद्धृत अंश दो-तीन वाक्यों से ज्यादा लंबा  हो तो उसे अलग पैरा में दें। ऐसा उद्धृत पैराग्राफ अलग नजर आए इसके लिए उसके पहले बाद में एक लाइन का स्पेस दें और पूरा पैरा को इंडेंट करें और उसके टाइप साईज को छोटा रखें। उद्धृत अंश में लेखन की शैली और वर्तनी में कोई तबदीली या सुधार न करें । 

पादटिप्पणी और हवाला (साईटेशन):  सभी पादटिप्प्णियाँ और हवालों (साईटेशन) के लिए मूल पाठ में 1,2,3,4,..... सिलसिलेवार संख्या दे और आलेख के अंत में क्रम में दे। वेबसाईट के मामले में उस तारीख का भी जिक्र करे जब अपने उसे देखा हो। मसलन, पाठ 1, मनोरंजन महंती, 2002, पृष्ठ और हर हवाला के लिए पूरा संदर्भ आलेख के अंत में दें।

सन्दर्भ: इस सूची में किसी भी संदर्भ का अनुवाद करके न लिखें, अथार्थ संदर्भो को उनकी मूल भाषा में रहने दें। यदि संदर्भ हिंदी व अंग्रेजी दोनों भाषाओं के हो तो पहले हिन्दी वाले संदर्भ लिखें तथा इन्हें हिन्दी वर्णमाला के अनुसार, और बाद में अंग्रेजी वाले संदर्भ को अंग्रेजी वर्णमाला के अनुसार सूचीबद्ध करें । 

•ए.पी.ए. स्टाइल फोलो करें। 

•मौलिकताः ध्यान रखें कि आलेख किसी अन्य जगह पहले प्रकाशित नहीं हुआ हो तथा न ही अन्य भाषा में प्रकाशित आलेख का अनुवाद हो। यानी आपका आलेख मौलिक रूप से लिखा गया हो। 

•कोशिश होगी कि इसमें शामिल ज्यादातर आलेख मूल रूप से हिंदी में लिखे गए हो । लेखकों से अपेक्षा होगी कि वे दूसरे किसी लेखक के विचारों और रचनाओं का सम्मान करते हुए ऐसे हर उद्धरण के लिए समुचित हवाला/संदर्भ देंगे ।अकादमिक जगत के भीतर बिना हवाला दिए नकल या दूसरों के लेखन और विचारों को अपना बताने (प्लेजियरिज्म) की बढ़ती प्रवृत्ति देखते हुए लेखकों का इस बारे मे विशेष ध्यान देना होगा । 

•समीक्षा और स्वीकृतिः प्रकाशन के लिए भेजी गयी रचनाओं पर अंतिम निर्णय लेने के पहले संपादक मडंल दो समीक्षकों की राय लेगा, अगर समीक्षक आलेख मे सुधार की माँग करें तो लेखक को उन पर गौर करना होगा।

•संपादन व सुधार का अंतिम अधिकार संपादकगण के पास सुरक्षित हैं। 

•कापीराइटः प्रकाशन का कापीराइट लेखक के पास ही रहेगा पर हर रूप में उसका प्रकाशन का अधिकार आई आई पी ए के पास होगा। वे अपने प्रकाशित आलेख का उपयोग अपनी लिखी किताब या खुद संपादित किताब मे आभार और पूरे संदर्भ के साथ कर सकते हैं। किसी दूसरे द्वारा संपादित किताब में शामिल करने की स्वीकृति देने के पहले उन्हें आई आई पी ए से अनुमति लेनी होगी।
 

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