लोक प्रशासन

Association with Indian Institute of Public Administration

Current Volume: 15 (2023 )

ISSN: 2249-2577

Periodicity: Quarterly

Month(s) of Publication: मार्च, जून, सितंबर और दिसंबर

Subject: Social Science

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लोक प्रशासन भारतीय लोक प्रशासन संस्थान की एक सहकर्मी समीक्षा वाली त्रैमासिक शोध पत्रिका है ! यह UGC CARE LIST (Group -1 ) में दर्ज है ! इसके अंतर्गत लोक प्रशासन, सामाजिक विज्ञान, सार्वजनिक निति, शासन, नेतृत्व, पर्यावरण आदि से संबंधित लेख प्रकाशित किये जाते है !

अध्यक्ष
श्री एस. एन. त्रिपाठी

महानिदेशक, आई. आई. पी. ए. 
नई दिल्ली


सम्पादक
डा0 साकेत बिहारी 

आई. आई. पी. ए, नई दिल्ली


सह-सम्पादक
डा0 कृष्ण मुरारी 

दिल्ली विश्वविद्यालय,
नई दिल्ली


सम्पादक मंडल
श्री के. के. सेठी

अध्यक्ष, मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ
 क्षेत्रीय शाखा (आई. आई. पी. ए,)


प्रो. श्रीप्रकाश सिंह

दिल्ली विश्वविद्यालय, नई दिल्ली


डा0 शशि भूषण कुमार

सह-आचार्य, मुजफ्फरपुर
बिहार


डा0 अभय प्रसाद सिंह

दिल्ली विश्वविद्यालय
नई दिल्ली 


डा0 रितेश भारद्वाज

दिल्ली विश्वविद्यालय,
नई दिल्ली


श्री अमिताभ रंजन

कुलपति,आइ.आइ.पी.ए. नई दिल्ली


पाठ संशोधक
स्नहे लता

Volume 15 Issue 1 , (Jan- to Mar-2023)

सम्पादकीय
सुशासन: सहभागिता, जवाबदेही और पारदर्शिता

By: ..

भारत में संघवाद के बदलते आयाम

By: विजय शकंर चैधरी

Page No : 1-14

Abstract
सारांशः प्रस्तुत आलेख ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में भारत में संघवाद के बदलते आयामों का विश्लेषण करता है। संघवाद की उत्पत्ति भारत सरकार अधिनियम,1935 से र्हुइ । संघवाद सरकार का वह रूप है जिसमें शक्ति का विभाजन आंशिक रूप से केंद्र सरकार और राज्य सरकारों अथवा क्षेत्रीय सरकारों के मध्य होता है। संघवाद संवैधानिक तौर पर शक्तिको साझा करता है क्योंकि इसमें स्वशासन तथा साझा शासन की व्यवस्था होती है।आजादी के उपरांत से लेकर अब तक भारतीय संघवाद का स्वरूप बदलता रहा है।भारतीय राजनीति में र्कइ ऐसे परिवर्तन हुए जिसने संघीय प्रणाली को कई स्तरों पर प्रभावित किया है। इसके कारण देश में संघवाद के अलग-अलग चरण देखने को मिलते हैं। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद ‘एकदलीय प्रभुत्व’ के दौरान ‘केंद्रीकृत संघवाद’ था।
राजनीतिक एकल सत्ता और समय की माँग ने एक ऐसे परिस्थिति निर्मित की कि जनता के सामने ध्रुवतारा के रूप में नरेन्द्र मोदी आए और वर्ष 2014 के आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने पूर्ण बहुमत प्राप्त कर सौदेबाजी व्यवस्था का वस्तुतः अंत कर दिया। गठबंधन की राजनीति चलती रही लेकिन सौदेबाजी बिल्कुल नियंत्रण में रही। इस सरकार ने अनुच्छेद 356 का कम दुरुपयागे किया। 2014 से लेकर अब तक भारतीय जनता पार्टी ठासे रूप से सत्ता में है। इसके फलस्वरूप केंद्र राज्यों के मुकाबले और मजबूत हो गया। 2014 के बाद पुनः केंद्रीकरण की प्रवृतियाँ मजबूत होने लगी हैं। जीएसटी, नीति आयोग, एनआईए (NIA) एवं कोरोना महामारी के विरूद्ध संघर्ष के कारण केंद्र की महती भूमिका हो गई है।

Author :
विजय शकंर चैधरी : शोधार्थी, राजनीति विज्ञान विभाग, महात्मा गाँधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी, बिहार।
 

Price: 251

भारतीय परिप्रेक्ष्य में उच्च शिक्षा के समक्ष सीखने का अनुकूलतम वातावरणः सन्दर्भ एवं चुनौतियाँ

By: कुमारी रितु सिंह

Page No : 15-24

Abstract
मनुष्य में सीखने की उत्कट प्रवृत्ति उसे सभी सजीवों में विशिष्टतम स्थान प्रदान करती है। सीखना एक जीवन-पर्यंत चलने वाली प्रक्रिया है जिसका संपादन विभिन्न चरणों, प्रक्रियाओं एवं परिस्थितियों में होता है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो औपचारिक तथा अनौपचारिक दोनों प्रकार से संपादित होती है। व्यक्ति के सीखने की व्यवस्थित एवं योजनाबद्ध क्रिया औपचारिक परिवेश एवं वातावरण में संपादित होती है तथा व्यक्ति की अनौपचारिक शिक्षा सीखने के अनौपचारिक परिवेश एवं वातावरण में फलीभूत होती है। सीखने की प्रक्रिया को व्यक्ति औपचारिक रूप से एवं संज्ञानात्मक ढंग से कुछ समूह, संस्थाओं एवं निकायों की सहायता से संपादित करता है। इसमें प्रमुख रूप से विद्यालय, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय तथा अन्य संस्थाएं आती हैं। वहीं अनौपचारिक शिक्षण में परिवार, साथी, समहू , समुदाय, सांस्कृतिक समूह एवं समस्त सामाजिक क्रियाओं- अनुक्रियाऔ को रखा जा सकता है जो संज्ञानात्मक या गैर-संज्ञानात्मक रूप से सीखने की प्रक्रिया को संपादित करती रहती है ।

Author :
कुमारी रितु सिंह :
शोधार्थी, (पी.एच.डी.) महात्मा गाँधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी, बिहार।
 

Price: 251

भारत में सकारात्मक कार्यवाही और आरक्षण

By: अरविन्द कुमार यादव

Page No : 25-58

Abstract
भारत में कई दशकों से सकारात्मक कार्र वाई नीति के तहत समाज के उपेक्षित वर्गो को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास किया जाता रहा है। सरकार ने उपेक्षित वर्गो के चहुँमुखी विकास के लिए सामाजिक न्याय के तहत अनेक लक्ष्य निर्धारित किए है जिसमें उनके समावेशीकरण करने के लिए अनेक नीतियां प्रमुख है। भारतीय समाज के उपेक्षितों को मुख्यधारा में शामिल करने के लिए अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा वर्ग, दिव्यांग, महिला और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गो के लिए भारतीय संविधान में आरक्षण का प्रावधान किया गया है ताकि आरक्षित वर्गों का सामाजिक, आर्थिकं और शैक्षणिक पिछड़ापन को दूर किया जा सके । संविधान का यह लक्ष्योन्मुख प्रावधान राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है । प्रस्तुत शोध -पत्र में आरक्षित समुदायों के ऊपर आरक्षण का सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव को विभिन्न तथ्यों एवं की सहायता से समीक्षा की गई है ।

Author :
अरविन्द कुमार यादव :
सह­आचार्य, राजनीति विज्ञान विभाग, डा0 भीम राव अम्बेडकर महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली।
 

Price: 251

भारत में ई-कॉमर्स बनाम भौतिक खुदरा स्टोरः एक तुलनात्मक अध्ययन

By: जगदीप सिंह , ममता कुमारी

Page No : 59-72

Abstract
उपभोक्ताओं का ध्यान पारंपरिक वितरण चैनलों से हटकर ऑनलाइन/ई-कॉमर्स वितरण चैनलों की ओर जा रहा है, जो पारंपरिक और केवल-क्लिक चैनलों का एक मिश्रण है। इंटरनेट विशेष रूप से ई-कॉमर्स ने वाणिज्यिक परिदृश्य को मौलिक रूप से बदल दिया है। ई-कॉमर्स पहले कुछ सेवाओं जैसे एयरलाइन टिकट, ट्रेन टिकट, होटल बुकिंग, ऑनलाइन सेल-फोन रिचार्जिंग आदि तक सीमित था। हाल ही में, ई-कॉमर्स ने खुदरा और किराना क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर प्रवेश किया है। अधिकांश व्यक्ति ऑनलाइन खरीदारी करना पसंद करते हैं क्योंकि वो घर बैठे खरीददारी कर सकते हैं। उत्पाद की गुणवत्ता का प्रभाव सब्जियों, किराना या दोनों के लिए क्रय निर्णयों को प्रभावित करता है। यह भी पता चला है कि स्थानीय दुकानों की तुलना मे इंटरनेट की कीमतें काफी कम है। हालांकि हम स्थानीय कंपनियों के साथ सौदेबाज़ी कर सकते हैं, लेकिन स्थानीय व्यापारियों और इंटरनेट पोर्टलों के बीच कीमतों में काफी असमानता है। ई-कॉमर्स बाजार को व्यापक बनाने के लिए सभी आपूर्तिकर्ताओ और ग्राहकों को एक मंच पर एक साथ लाने का प्रयास करता है। यहां तक कि अमेज़ॉन, फ्लिपकार्ट, ग्रोफर्स और कई अन्य जैसे बड़े निगम स्थानीय किराना डीलरों को अपने वेब पोर्टलो के माध्यम से बेचने के लिए उत्तरोत्तर प्रोत्साहित कर रह हैं; फिर भी, उनमें से कई जागरूकता की कमी और तकनीकी कठिनाइयों के कारण ऐसा करने में असमर्थ हैं। अध्ययन में पाया गया कि ई-कॉमर्स वेबसाइटो पर कीमतें छोटे किराना स्टोर (स्थानीय खुदरा विक्रेताओं) की कीमतों की तुलना में काफी कम है, लेकिन स्थानीय किराना दुकानों मं सौदेबाजी संभव है। छोटी किराना दुकानों और ई-कॉमर्स वेबसाइटो या इंटरनेट पोर्टल के बीच, कीमतों में महत्वपूर्ण अंतर और कटौती होती है।

Author :
जगदीप सिंह :
प्रोपराइटर रीकैप कंसल्टेंसी एंड जनरल सप्लाई धोराजी , राजकोट, गुजरात।
ममता कुमारी : के.वी.के जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय, पिपलिया, राजकोट, गुजरात।
 

Price: 251

भारतीय श्रमिक आंदोलन के समक्ष चुनौतियाँः अतीत से वर्तमान तक

By: डा0 रूणा आनंद

Page No : 73-89

Abstract
श्रमिक आंदोलन का विकास स्वतत्रंता पूर्व ब्रिटिश शासन, भारतीय राजनैतिक विचारधारा एवं विश्व-पटल पर होने वाले श्रमिक आंदोलनो या परिवर्तनों से प्रभावित था। कालांतर में, विभिन्न प्रकार की समस्याओं के निराकरण के लिए समय-समय पर श्रमिक आंदोलनो के द्वारा, राज्य की ओर से सहायता प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता रहा  है। श्रमिक आंदोलन की सफलता राज्य और पूंजीपतियो द्वारा दी गई प्रतिक्रिया पर निर्भर  करती है। मुख्यतः यह आंदोलन श्रम, पूंजी और सरकार के अन्यान्याश्रित संबंध पर निर्भर है। श्रमिक अपने श्रम से पूंजी निर्माण करते है और उस पूंजी में संतोषजनक भाग मिलने की उम्मीद करते है। राज्य से उन्हें यह अपेक्षा रहती है कि, राज्य उनके मानवाधिकार और नागरिक अधिकारों कि रक्षा कर संरक्षण और संवर्धन में भी सहयोग करें। राज्य, श्रम और पूंजी के इस संबंध ने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से, मुख्य रूप से उदारीकरण और वैश्वीकरण के समय श्रमिक आंदोलन के स्वरूपों और उदेश्यो को अत्याधिक प्रभावित किया है। यह शोध -पत्र सिर्फ औपचारिक श्रमिकों तक सीमित है। जिनका विश्लेषणात्मक एवं विवरणात्मक अध्ययन किया गया है लेकिन वर्तमान में अनौपचारिक श्रमिकों के  आंदोलन की बदलती भूमिका के कारण यथायोग्य अति संक्षिप्त में उन पर भी प्रकाश डाला गया है।

Author :
डा0 रूणा आनंद : 
सहायक आचार्या, अध्यक्ष, राजनीति शास्त्र विभाग, वैशाली महिला कॉलेज, बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, बिहार।
 

Price: 251

गाँधी जी एवं समावेशी विकास का सशक्त आधारः सर्वोदय 

By: डा0 संतोष कुमार सिंह

Page No : 90-103

Abstract
समावेशी विकास एक बहुआयामी सिद्धान्त है, जो  सर्वजन हिताय एवं सर्वजन सुखाय तथा सम्यक न्याय पर आधारित है। यह सिद्धान्त अवसर की समानता सुनिश्चित करती है, जिससे व्यक्ति अपने कौशल विकास के माध्यम से राष्ट्र में अपनी सशक्त भागीदारी निभा सके। समावेशी विकास में जनसंख्या के सभी वर्गो के लिए बुनियादी सुविधाओं के प्रदान करने के साथ गरिमामयी जीवन जीने के साधनो का विकास तलाश करता है। समावेशी विकास का उद्देश्य एक ऐसे राज्य का निर्माण करता है जिसमें व्यक्ति का सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक विकास हो सके। समावेशी विकास की संकल्पना गरीबी उन्मूलन के पारम्परिक उद्देश्य से भी ऊपर उठकर समाज के वंचित  और पिछडे़ वर्गों का सशक्तिकरण करना है। इस द्रिष्टि से भारत के पास गाँधी जी का अनुकरण करने और उनसे प्रेरणा ग्रहण करने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है। उन्होंने जो संदेश दिया, उसे बिना अतिरिक्त प्रयास के प्रयोग में लाया जा सकता है। उन्हें बहुत पहले ही इस बात का अहसास हो गया था कि भारत को भविष्य में अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। इसी वजह से उन्होंने इस देश को हमेशा के लिए  महान और गौरवशाली राष्ट्र बनाए रखने के लिए समावेशी विकास का एक माॅडल  ‘सर्वोदय‘ प्रस्तुत किया। समावेशी विकास के रूप में गाँधी जी द्वारा वर्णित सर्वोदय ही वह विचार है जो सबके कल्याण को परिभाषित करता है। अथार्थ वेश्विक परिद्र्श्य से इसका आशय लिया जाए तो इस द्रिष्टिकोड से सभी का उदय हो और जिससे सभी का सर्वागीढ विकास हो सके। सर्वोदय सिद्धान्त में प्रत्येक व्यक्ति का ध्यान रखा जाता है और  यह “वसुधैव कुटुम्बकम्” की अवधारणा को सशक्त बनाती है। सही अर्थो में सर्वोदय ही वह सिद्धान्त है जो समावेशी विकास के समस्त आयामों को स्पर्श करता है ।

Author :
डा0 संतोष कुमार सिंह : 
सहायक आचार्य, अध्यक्ष, राजनीति विज्ञान विभाग, रानी धर्म कुँवर राजकीय महाविद्यालय, दल्लावाला, खानपुर, हरिद्वार, उत्तराखंड। 
 

Price: 251

शिक्षा नीति एवं शिक्षानीति की प्रासगिकता 

By: कु0 वीणा कुमारी , डा0 गजानंद सिंह

Page No : 104-112

Abstract
किसी भी समाज या देश की प्रगति में शिक्षा का धुरीय महत्व होता है। भारतीय शिक्षा कामोबेश मेकाॅले की विरासत को आज भी ढो रही है। परन्तु उसमें आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है। आज जरूरत है एक आवश्यकता एवं कौशल आधारित शिक्षा की जो भारतीय सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों तथा भारतीय संस्कृति के अनुरूप हो। साथ ही इसमें महिलाओं के मानवाधिकारों की संरक्षा के उत्क्रम भी हो क्योंकि शिक्षा ही व्यक्ति को उचित-अनुचित, नैतिक-अनैतिक आदि मूलयो का ज्ञान करवाती है तथा अपने अधिकार व कर्तव्यो का बोध करवाती है जिससे एक सभ्य समाज का निर्माण होता है। इसी वैचारिक पृष्ठभूमि में प्रस्तुत आलेख प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था एवं महिलाओं के शिक्षा संबंधी अधिकारो  के आलोक में वर्तमान शिक्षा नीति 2020 के परीक्षण का एक प्रयास है। प्रस्तुत अनुशीलन से यह उजागर होता है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 प्राचीन भारतीय शिक्षा व्यवस्था की तरह महिलाओ  के शिक्षा संबंधी अधिकारो के अनुरूप है।

Authors :
कु0 वीणा कुमारी :
शोध छात्रा, राजनीति विज्ञान विभाग, जी.बी. काॅलेज, वीर कुँवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा, बिहार। 
डा0 गजानंद सिंह : आचार्य, अध्यक्ष, राजनीति विज्ञान विभाग, वीर कुँवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा, रामगढ़ कैमूर , बिहार।
 

Price: 251

विश्व आधिपत्य की लालसाः यूक्रेन युद्ध में अमेरिका की अवांछनीय भूमिका

By: डा0 पकंज लखेरा

Page No : 113-124

Abstract
रूस और यूक्रेन के बीच चल रहा युद्ध समकालीन अंतरराष्ट्रीय राजनीति की प्रमुख घटनाओं में से एक है। यह वैश्विक तनाव पैदा कर रहा है, हथियारो की होड़ बढ़ा रहा है, दुनिया के विभिन्न हिस्सों मे सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर रहा है और यहां तक कि परमाणु संघर्ष में भी समाप्त हो सकता है। आर्थिक रूप से यह न केवल युद्धरत राष्ट्रों के लिए बल्कि पूरे विश्व के लिए एक आपदा होगी। इसके परिणामस्वरूप दुनिया भर में तेल, प्राकृतिक गैस, खाद्यान्न, मोटल और अन्य वस्तुओं की आपूर्ति में कमी आ रही है क्योंकि रूस और यूक्रेन इन सभी वस्तुओं के प्रमुख निर्यातक हैं। बढ़ती मुद्रास्फीति के परिणामस्वरूप दुनिया के विभिन्न हिस्सो में धीमी आर्थिक वृद्धि, बढ़ती गरीबी और बढ़ती भूख हो अवश्यंभावी है। संक्षेप में कहें तो युद्ध विश्व व्यवस्था को काफी हद तक बदल सकता है। यूक्रेन वस्तुतः एक युद्ध का मैदान बन गया है जहाँ दुनिया की प्रमुख शक्तियाँ अपनी सेन्यें तकनीकी शक्ति का प्रदर्श न कर रही हैं। सामान्यतया, नाटो में शामिल होने या न होने के लिए यूक्रेनी संप्रभुता के सवाल पर युद्ध लड़ा जा रहा है। लेकिन, पूरी स्थिति का गहन विश्लेषण एक अलग तस्वीर पेश करता है। एक युद्ध जो रूस यूक्रेन को नाटो में शामिल नहीं होने देने के लिए लड़ रहा है, एक युद्ध जो यूक्रेन अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता की रक्षा के लिए जारी किए हुए है, एक युद्ध जिसे अमेरिका लोकतंत्र के नाम पर प्रायोजित कर रहा है। एक ऐसा युद्ध जहां अमेरिका केवल अपने राष्ट्रीय हितो को देख रहा है और पूरी दुनिया को दांव पर लगा दिया है । यह शोध पत्र वर्तमान स्थिति में अमेरिका की भूि मका का विश्लेषण करना चाहता है। क्या अमेरिका लोकतंत्र और विश्व व्यवस्था को मजबूत करना चाहता है या वह सिर्फ रूस को कमजोर करना चाहता है और युद्ध के बढ़ने के माध्यम से अपना विश्व आधिपत्य जारी रखना चाहता है? क्या अमेरिका के लिए यह बुद्धिमानी होगी कि वह रूस पर अधिक ध्यान केंद्रित करे और उस वास्तविक चुनौती को नजरअंदाज करे जो बढ़ते चीन के रूप में है?

Author :
डा0 पकंज लखेरा :
सह­आचार्य, राजनीति विज्ञान विभाग, स्वामी श्रद्धानंद काॅलेज दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली।
 

Price: 251

हरियाणा पंचायती राज चुनाव एवं निर्वाचन पात्राता शर्तें: एक अध्ययन

By: डा0 सुमन लता , डा0 अजीत कुमार

Page No : 125-138

Abstract
पंचायती राज संस्थाएं हमारे लोकतंत्र की आधार व ग्रामीण विकास की धुरी है। प्राचीन काल से ही परम्परा व भाईचारा पंचायतो का इतिहास रहा है इसी संदर्भ में सामाजिक मान्यताओं, स्थानीय व्यक्तियों तथा सरकार द्वारा इनको शक्तियाँ प्रदान की गई इनके निर्णय न्यायिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा धार्मिक आदि सभी क्षेत्रो में स्वीकार होते हैं इसलिए इनका पालन आत्मीयता से किया जाता है। स्वतंत्रता के पश्चात् केन्द्र तथा राज्य सरकारों ने तेजी से और योजनाबद्ध ग्रामीण विकास के लिए विभिन्न अधिनियमो एवं कार्यक्रमों को लागू किया है। आवश्यकतानुसार समय-समय पर इन अधिनियमों और कार्यक्रमों को संशॊधित भी किया जाता रहा है ताकि ग्रामीण विकास को गतिमान बनाया जा सके। इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए हरियाणा सरकार द्वारा पंचायती राज संस्थाओं में सुधारात्मक प्रयास के रूप में पाचंवें सामान्य पंचायती राज चुनाव में पात्रता शर्तो का निर्धारण किया गया। हरियाणा राज्य में पंचायती राज संस्थओ के वर्ष 1994, 2000, 2005, 2010 और 2016 में चुनाव संपन्न हुए है। प्रस्तुत प्रपत्र मे पंचायती राज संस्थाओ के चुनाव, 2016 में पात्रता शर्तों संबंधी प्रावधानों का विश्लेषण किया गया है। यह विश्लेषण प्राथमिक और द्वितीय स्त्रोतो पर आधारित है। जिसका मुख्य उद्देश्य पंच, सरपचं और ग्रामीण व्यक्तियो से पाचंवें सामान्य पंचायती राज चुनाव में लागू नवीन पात्रता शर्तो संबंधी द्रिष्टीकोड जानना और पंचायती राज संस्थाओं में सुधार सम्बंधित सुझाव देना है।

Authors :
डा0 सुमन लता :
सहायक आचार्या, लोक प्रशासन विभाग, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक (हरियाणा)।
डा0 अजीत कुमार : सहायक आचार्य, राजनीति विज्ञान विभाग, गौड़ ब्राह्मण डिग्री कॉलेज,रोहतक (हरियाणा)।
 

Price: 251

उत्तराखण्ड की आदिम जनजातिः वनराजी (वनरावत/वनरौत) की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति

By: डा0 घनश्याम जोशी , डा0 दीपक पालीवाल

Page No : 139-148

Abstract
उत्तराखण्ड में मुख्यतः पाचं प्रकार का जनजाति समाज रहता है। जिसमें भोटिया,थारू, जौनसारी, बोक्सा और वनरावत या वनराजी हैं। पहले चार प्रकार की जनजाति समाज अपने प्राकृतिक स्वरूप, परम्पराओं और मान्यताओंके साथ आधुनिक समाज मेंरच-बस गया है। किन्तु एक जनजाति समाज जिसे वनरावत या वनराजी नाम से जाना जाता है, समाज की मुख्य धारा से बहुत दूर रहा और अल्पतज्ञात के कारण आदिम जनजाति की श्रेणी में बना रहा्। इस शोध-पत्र के माध्यम से आदिम जनजाति, वनरावत का समाज की मुख्य धारा में जुड़ने और इससे उनके सामाजिक और राजनीतिक स्थिति में आए बदलावो का अध्ययन करना है। यह जनजाति उत्तराखण्ड की अन्य जनजातियों से इस मामले में भिन्न है। इनकी जनसंख्या कुछ सैकड़ों में ही बची है और इनके विलुप्त होने का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। 

Authors :
डा0 घनश्याम जोशी :
सहायक प्राध्यापक, लोक प्रशासन विभाग, उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय, राजकीय महाविद्यालय, दल्लावाला, खानपुर, हरिद्वार, उत्तराखंड । 
डा0 दीपक पालीवाल : सह­प्राध्यापक, समाज शास्त्र विभाग, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, नई दिल्ली।
 

Price: 251

राज्य सरकारों द्वारा लोक सेवा प्रदायगी का अधिकार-राज्य कानूनों का तुलनात्मक अध्ययन तथा संसदीय विधान की आवश्यकता 

By: डा0 जोरावर सिंह राणावत

Page No : 149-162

Abstract
सेवाओं की प्रभावी प्रदायगी और सुशासन के लिए सरकारों ने कई प्रयास किए हैं जिनमें समय-समय पर प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन, नागरिक अधिकार पत्र लागू करना, सूचना का अधिकार जैसे अधिनियम बनाना आदि प्रमुख हैं। इसी क्रम में देश में सर्वप्रथम मध्यप्रदेश राज्य ने मध्यप्रदेश लोक सेवाओं के प्रदान का अधिनियम, 2010 पारित कर सुशासन की नई दिशा दिखाई है जिसका अन्य राज्यों ने भी अनुसरण किया है। इसके अतिरिक्त केन्द्र सरकार ने भी नागरिक अधिकार पत्र विधेयक, 2011 प्रस्तुत कर इस दिशा में कदम बढ़ाया है।  प्रस्तुत लेख में देश में सुशासन हेतु अब तक किए गए प्रयासों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करते हुए राज्यों द्वारा लाके सेवा प्रदायगी हेतु पारित किए गए अधिनियमो का तुलनात्मक अध्ययन किया गया हैं और केन्द्र द्वारा प्रस्तुत किए गए विधेयक का भी संक्षिप्त विवरण  दिया गया है। अन्त में लोक सेवा प्रदायगी के क्षेत्र में भविष्य की संभावनाओं पर प्रकाश डाला गया है।

Author :
डा0 जोरावर सिंह राणावत :
सहायक आचार्य, अध्यक्ष, राजनीति शास्त्र विभाग, भीलवाड़ा (राजस्थान), संगम विश्वविद्यालय।
 

Price: 251

पुस्तक समीक्षाः 
हिमांशु राय (2021), पॉलिटिकल थॉट इन इंडिक सिविलाइजेशन, सम्पादक, सेज,नई दिल्ली, पृष्ठ 314, मूल्यः 1,395 रूपये 

By: Kalpesh B. Panara

Page No : 163-168

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Instruction to the Author

आलेख में सामग्री को इस क्रम में व्यवस्थित करेंः आलेख के शीर्षक, लेखकों के नाम, पते और ई-मेल, लेखकों का परिचय, सार संक्षेप, (abstract) संकेत शब्द, परिचर्चा, निष्कर्ष/सारांश, आभार (यदि आवश्यक हो तो) और संदर्भ सूची । 

सारसंक्षेपः सारसंक्षेप (abstract) में लगभग 100-150 शब्द होने चाहिए, तथा इसमें आलेख के मुख्य तर्को का संक्षिप्त ब्यौरा हो। साथ ही 4-6 मुख्य शब्द (Keywords) भी चिन्हित करें । 

आलेख का पाठः आलेख 4000-6000 शब्दों से अधिक न हो, जिसमें सारणी, ग्राफ भी सम्मिलित हैं। 

टाइपः कृपया अपना आलेख टाइप करके वर्ड और पीडीएफ दोनों ही फॉर्मेट में भेजे । टाइप के लिए हिंदी यूनिकोड का इस्तेमाल करें, अगर आपने हिंदी के किसी विशेष फ़ॉन्ट का इस्तेमाल किया हो तो फ़ॉन्ट भी साथ भेजे, इससे गलतियों की सम्भावना कम होगी, हस्तलिखित आलेख स्वीकार नहीं किए जाएंगे। 

अंकः सभी अंक रोमन टाइपफेस में लिखे। 1-9 तक के अंको को शब्दों में लिखें, बशर्ते कि वे किसी खास परिमाण को न सूचित करते हो जैसे 2 प्रतिशत या 2 किलोमीटर। 

टेबुल और ग्राफः टेबुल के लिए वर्ड में टेबुल बनाने की दी गई सुविधा का इस्तेमाल करें या उसे excel में बनाएं। हर ग्राफ की मूल एक्सेल कॉपी या जिस सॉफ़्टवेयर मैं उसे तैयार किया गया हो उसकी मूल प्रति अवश्य भेजे  सभी टेबुल और ग्राफ को एक स्पष्ट संख्या और शीर्षक दें। आलेख के मूल पाठ में टेबुल और ग्राफ की संख्या का समुचित जगह पर उल्लेख (जैसे देखें टेबुल 1 या ग्राफ 1) अवश्य करें। 

चित्राः सभी चित्र का रिजोलुशन कम से कम 300 डीपीआई/1500 पिक्सेल होना चाहिए। अगर उसे कही और से लिया गया हो तो जरूरी अनुमति लेने की जिम्मेदारी लेखक की होगी।

वर्तनीः किसी भी वर्तनी के लिए पहली और प्रमुख बात है एकरूपता। एक ही शब्द को अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग तरीके से नहीं लिखा जाना चाहिए। इसमें प्रचलन और तकनीकी सुविधा दोनों का ही ध्यान रखा जाना चाहिए।

• नासिक उच्चारण वाले शब्दों में आधा न् या म् की जगह बिंदी/अनुस्वार का प्रयोग करें। उदाहरणार्थ, संबंध के बजाय संबंध, सम्पूर्ण की जगह संपूर्ण लिखें। 

• अनुनासिक उच्चारण वाले शब्दों में चन्द्रबिन्दु का प्रयोग करें। मसलन, वहाँ, आये , जाएंगे, महिलाएं, आदि-आदि। कई बार सिर्फ बिंदी के इस्तेमाल से अर्थ बदल जाते हैं। इसलिए इसका विशेष ध्यान रखें, उदाहरण के लिए हंस और हँस। 

• जहाँ संयुक्ताक्षरों मौजूद हों और प्रचलन में हों वहाँ उन संयुक्ताक्षरों का भरसक प्रयोग करें। 

• महत्व और तत्व ही लिखें, महत्व या तत्व नहीं। 

• जिस अक्षर के लिए हिंदी वर्णमाला में अलग अक्षर मौजूद हो, उसी अक्षर का प्रयोग करें। उदाहरण के लिए, गए गयी की जगह गए, गई लिखें। 

• कई मामलों में दो शब्दों को पढ़ते समय मिलाकर पढ़ा जाता है उन्हें एक शब्द के रूप् में ही लिखें। उदाहरण के लिए, घरवाली, अखबारवाला, सब्जीवाली, गाँववाले, खासकर, इत्यादि। 

• पर कई बार दो शब्दों को मिलाकर पढ़ते के बावजूद उन्हें जोड़ने के लिए हाइफन का प्रयोग होता है। खासकर सा या सी और जैसा या जैसी के मामले में। उदाहरण के लिए,एक-सा, बहुत-सी, भारत-जैसा, गांधी-जैसी, इत्यादि। 

• अरबी या फारसी से लिए गए शब्दों में जहाँ मूल भाषा में नुक्ते का इस्तेमाल होता है। वहाँ नुक्ता जरूर लगाएं। ध्यान रहें कि क, ख, ग, ज, फ वाले शब्दों में नुक्ते का इस्तेमाल होताहै। मसलन, कलम, कानून, खत, ख्वाब, खैर, गलत, गैर इलरजत, इजाफा, फर्ज, सिर्फ। 

उद्धरणः पाठ के अंदर उद्धृत वाक्यांशों को दोहरे उद्धरण चिह्न (’ ’) के अंदर दें। अगर उद्धृत अंश दो-तीन वाक्यों से ज्यादा लंबा  हो तो उसे अलग पैरा में दें। ऐसा उद्धृत पैराग्राफ अलग नजर आए इसके लिए उसके पहले बाद में एक लाइन का स्पेस दें और पूरा पैरा को इंडेंट करें और उसके टाइप साईज को छोटा रखें। उद्धृत अंश में लेखन की शैली और वर्तनी में कोई तबदीली या सुधार न करें । 

पादटिप्पणी और हवाला (साईटेशन):  सभी पादटिप्प्णियाँ और हवालों (साईटेशन) के लिए मूल पाठ में 1,2,3,4,..... सिलसिलेवार संख्या दे और आलेख के अंत में क्रम में दे। वेबसाईट के मामले में उस तारीख का भी जिक्र करे जब अपने उसे देखा हो। मसलन, पाठ 1, मनोरंजन महंती, 2002, पृष्ठ और हर हवाला के लिए पूरा संदर्भ आलेख के अंत में दें।

सन्दर्भ: इस सूची में किसी भी संदर्भ का अनुवाद करके न लिखें, अथार्थ संदर्भो को उनकी मूल भाषा में रहने दें। यदि संदर्भ हिंदी व अंग्रेजी दोनों भाषाओं के हो तो पहले हिन्दी वाले संदर्भ लिखें तथा इन्हें हिन्दी वर्णमाला के अनुसार, और बाद में अंग्रेजी वाले संदर्भ को अंग्रेजी वर्णमाला के अनुसार सूचीबद्ध करें । 

•ए.पी.ए. स्टाइल फोलो करें। 

•मौलिकताः ध्यान रखें कि आलेख किसी अन्य जगह पहले प्रकाशित नहीं हुआ हो तथा न ही अन्य भाषा में प्रकाशित आलेख का अनुवाद हो। यानी आपका आलेख मौलिक रूप से लिखा गया हो। 

•कोशिश होगी कि इसमें शामिल ज्यादातर आलेख मूल रूप से हिंदी में लिखे गए हो । लेखकों से अपेक्षा होगी कि वे दूसरे किसी लेखक के विचारों और रचनाओं का सम्मान करते हुए ऐसे हर उद्धरण के लिए समुचित हवाला/संदर्भ देंगे ।अकादमिक जगत के भीतर बिना हवाला दिए नकल या दूसरों के लेखन और विचारों को अपना बताने (प्लेजियरिज्म) की बढ़ती प्रवृत्ति देखते हुए लेखकों का इस बारे मे विशेष ध्यान देना होगा । 

•समीक्षा और स्वीकृतिः प्रकाशन के लिए भेजी गयी रचनाओं पर अंतिम निर्णय लेने के पहले संपादक मडंल दो समीक्षकों की राय लेगा, अगर समीक्षक आलेख मे सुधार की माँग करें तो लेखक को उन पर गौर करना होगा।

•संपादन व सुधार का अंतिम अधिकार संपादकगण के पास सुरक्षित हैं। 

•कापीराइटः प्रकाशन का कापीराइट लेखक के पास ही रहेगा पर हर रूप में उसका प्रकाशन का अधिकार आई आई पी ए के पास होगा। वे अपने प्रकाशित आलेख का उपयोग अपनी लिखी किताब या खुद संपादित किताब मे आभार और पूरे संदर्भ के साथ कर सकते हैं। किसी दूसरे द्वारा संपादित किताब में शामिल करने की स्वीकृति देने के पहले उन्हें आई आई पी ए से अनुमति लेनी होगी।
 

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